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करोड़ो का कारोबार होता था इस ऐतिहासिक कपड़े की हाट में, अब छाई है मंदी

संत कबीर नगर के खलीलाबाद की तर्ज पर 1952 से यहं के बुनकरों ने यहां हाट लगाने की परम्परा शुरू की

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ambedkar nagar

अम्बेडकर नगर. बुनकर नगरी के रूप में पूरे देश में प्रख्यात जिले का टांडा क़स्बा जहां कपड़ों की तो अपनी विशेषता है ही, साथ ही यहां लगने वाला कपड़े का साप्ताहिक हाट भी अपनी अलग पहचान रखता है। संत कबीर नगर के खलीलाबाद की तर्ज पर 1952 से यहं के बुनकरों ने यहां हाट लगाने की परम्परा शुरू की, जिसमें अम्बेडकर नगर जिले के बुनकरों के अलावा आसपास के कई जिलों संत कबीर नगर के मेंहदावल, बाराबंकी आदि के बुनकर अपना उत्पाद बेंचने के लिए आते रहे हैं और तबसे लगातार ये बुनकर सप्ताह में एक दिन शनिवार को लगने वाली हाट में कपड़ा बेंचने आते हैं।


कपड़े की खरीददारी करने के लिए भी टांडा की इस हाट में प्रदेश के लगभग सभी जिलों के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के अलावा अन्य कई प्रदेशों के व्यापारी यहां कपड़ा खरीदने आते रहे हैं। यहां के कपड़े की जो ख़ास बात है, वह यह है कि यहां का कपड़ा बेहद सस्ता पड़ता है और बड़े शहरों के व्यापारी इसका प्रयोग ज्यादातर रेडीमेड कपड़ा बनाने में इसका प्रयोग करते हैं साथ ही साथ यहां के कपड़े गरीबों के लिए भी आसानी से मिल जाते हैं। माना जाता है कि यहां तैयार होने वाला कपड़ा 6 रूपये मीटर से लेकर 30 रूपये मीटर तक मिल जाता है। साथ ही यहां का गमछा, लुंगी, चादरें, लड़कियों के स्टॉल और अरबी रुमाल बहुत ही सस्ते दाम पर मिल जाते हैं।


1952 से शुरू हुए यहां के हक्कानी हाट में पहले तो हथकरघा पर तैयार कपड़ों की बिक्री होती रही है, लेकिन जबसे यहां पावर लूम पर कपड़े तैयार होना शुरू हुआ यहां की हाट में काफी बिक्री होने लगी और यहां के बुनकरों की दिन दूनी रत चौगुनी तरक्की भी हुई, लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं दिखाई पड़ रही है। इस समय इस हाट में जबर्दस्त मंदी छाई हुई है और बुनकरों का तैयार कपड़ा लागत से कम दाम पर भी नहीं बिक पा रहा है।


दूसरों का तन ढकने वाले बुनकरों के सर्दी में छूट रहे हैं पसीने


इस समय पूरा भारत जबरदस्त ठण्ड की चपेट में है और अम्बेडकर नगर के बुनकर दिन रात एक करके लोगों के लिए गर्म कपड़े के साथ साथ तरह तरह के कपड़े तैयार कर रहे हैं, लेकिन इस ठण्ड के मौसम में लोगों के तन ढंकने वाले बुनकरों के ही पसीने छूट रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है यहां कपड़े के कारोबार में छाई हुई मंदी। जिस हक्कानी हाट में साप्ताहिक कारोबार करोड़ो में होता रहा है, वहां अब गिने चुने एक दो व्यापारी ही आ रहे हैं और वे भी बुनकरों के कपड़ो का जो दाम लगाते हैं वह उनकी लागत से भी कम है। बुनकर मोहम्मद शिबली का कहना है कि 1952 से शुरू हुई इस हाट में ऐसी मंदी कभी नहीं देखी गई । शिवली ने बताया कि टांडा में पहले प्रदेश के सभी जिलों के अलावा कई प्रदेशों से व्यापारी आते थे और अच्छी बिक्री होती थी, लेकिन अब हालत बहुत ही ख़राब है। बुनकर जुल्फेकार अशरफ का कहना है कि वह अपने 20 पावर लूम पर गमछा, चादरें और स्कार्फ बनाते हैं, लेकिन इस समय व्यापारी उनकी लागत से भी कम दाम पर खरीदना चाहते हैं।


सरकार की तरफ से सुविधा न होने से और भी है कठिनाई

यह क़स्बा जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर उत्तर में स्थित हैं। मुख्यालय पर स्थित रेलवे स्टेशन अकबरपुर है, लेकिन यहां के व्यापारियों के माल की ढुलाई का कोई समुचित प्रबंध नहीं है। टांडा में भी एक रेलवे स्टेशन है, जहाँ से पहले कपड़े की ढुलाई बाहर अन्य प्रदेशों तक होती रही है, लेकिन अब इसे आम व्यापारियों के लिए बंद कर दिया गया है और यहाँ केवल एनटीपीसी का कोयला ही आता है।


व्यापारी मोहम्मद हुसैन और रियाज़ अहमद बताते हैं कि यहां दूसरे प्रदेश के व्यापारी इसलिए नहीं आते हैं, क्योंकि यहं से माल ढुलाई का कोई साधन नहीं है। इसके अलावा यहां का पैटर्न काफी पुराना होने के कारण यहां के माल की गुणवत्ता अन्य जगहों के मुकाबले अच्छी नहीं है । इन लोगों की मांग है कि सरकार यहाँ सस्ते दर पर धागा उपलब्ध कराने के साथ ही यहां डाइंग और डिजाइनिंग की व्यवस्था कर दे तो न सिर्फ यहां का माल सस्ता तैयार होगा बल्कि बाहर के व्यापारी भी माल खरीदने के लिए आयेंगे।

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