26 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सूफी संत मखदूम साहब के 630वें उर्स का हुआ आगाज, जानिए उनकी दरगाह की खास बातें

लोग अपनी हर तरह की परेशानियों के लिए दरगाह पर आ कर मन्नत मंगाते हैं।

3 min read
Google source verification
Sufi Makhdoom Sahib urs in Ambedkar Nagar UP Hindi News

सूफी संत मखदूम साहब के 630वें उर्स का हुआ आगाज, जानिए उनकी दरगाह की खास बातें

अम्बेडकर नगर. उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर जिले में विश्व प्रसिद्ध सूफी संत हजरत मखदूम अशरफ की दरगाह हिन्दू मुस्लिम सहित सभी सम्प्रदायों की आस्था का केंद्र है। साल भर दरगाह पर जायरीनों का तांता लगा रहता है। लोग अपनी हर तरह की परेशानियों के लिए दरगाह पर आ कर मन्नत मंगाते हैं।

जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सूफी संत मखदूम अशरफ सिमनानी की दरगाह सभी सम्प्रदयों की आस्था का केंद्र है जिसे लोग किछौछा शरीफ के नाम से जानते हैं। सैकड़ों साल पूर्व खाड़ी देश ईरान के सिमनान प्रान्त से अपनी बादसाहत छोड़ कर आये इसी स्थान को मखदूम साहब ने अपनी कर्म भूमि बनाई और बिना किसी भेद भाव के लोगों की भलाई के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। लोगों का मानना है कि उस समय मखदूम साहब की दोस्ती किछौछा में रहने वाले कमाल पंडित से थी, जो बिना किसी भेद भाव के जीवन अंत समय तक रही और इसी वजह से दोनों संतों की मजार आस पास ही है।


इस दरगाह पर आस्था रखने वाले दोनों समुदायों के लोग बिना किसी भेद भाव के मजार पर आकर अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए दुआ मंगतें हैं। लोगों का अटूट विस्वास है की मखदूम साहब की दरगाह पर मांगी गयी मन्नत जरूर पूरी होती है। वैसे तो यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं का ताँता साल भर लगा रहता है ,लेकिन इस्लामिक मुहर्रम महीने की 27वीं और 28वीं तारीख़ को मखदूम साहब के उर्स पर देश विदेश से लाखों की संख्या लोग आकर जियारत करतें है। इस साल यह मखदूम साहब का 630 वां उर्स है, जिसकी शुरुआत मुहर्रम की 23 तारिख को परम्परानुसार नगाड़े बजाकर कर दी गई है।


मखदूम साहब की आस्था में दीपावली पर्व पर हजारों हिदू जलाते हैं यहां दिए

अजमेर के हजरत मोइनुद्दीन चिस्ती और दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन औलिया के समकालीन सूफी संत हजरत मखदूम अशरफ सिम्नानी की दरगाह पर हिन्दू मुस्लिम दोनों सम्प्रदयों की आस्था और एकता ही इस दरगाह और यहाँ के मानने वालों को बाकी स्थानों से अलग करती है। यहाँ की सबसे खास बात यह है कि मखदूम अशरफ के उर्स से पहले दीपावली पर हिदुओं के लिए खास अघानियाँ मेला लगता है, जिसमे देश के हर कोने से हजारों की संख्या में हिन्दू आकर दीपावली का दीप जलाकर मखदूम साहब से अपनी मन्नतें मंगतें हैं।


नीर शरीफ में स्नान से दूर होते हैं रोग

दरगाह के पास एक बड़ा तालाब है, जिसे आस्था में लोग इसे नीर शरीफ कहते हैं। मान्यता है कि जब मखदूम साहब यहाँ आये तो लोगों की भलाई के लिए एक तालाब की खुदाई कराई और ऐसा कहा जाता है कि इस तालाब की खुदाई के समय फावड़े चलने के साथ ही कुरआन की आयतें पढ़ी जाति रही हैं और इसी वजह से इस तालाब में ईश्वरीय शक्ति आ गई है। यह मान्यता है कि किसी तरह की शास्रीरिक या मानसिक बीमारी इस तालाब के पानी मात्र से दूर हो जाति है। अपनी बीमारियों से निजात पाने के लिए लोग इस नीर शरीफ में नहाते हैं और इसका पानी भर कर घरों को भी ले जाते है। यह भी कहा जाता है कि इस पानी की जाँच कराई गई तो यह पानी पूरी तरह पीने योग्य बताया गया। इसलिए लोगों का विश्वास है कि नीर शरीफ में नहाने से हर तरह के मर्ज दूर हो जातें है।


मखदूम साहब के नवासे के खानदान के लोग करते हैं देखभाल

मखदूम साहब के बारे में ये भी कहा जाता है की उनकी कोई औलाद नहीं थी और उनके शरीर त्यागने के बाद के बाद उनके भांजे सबसे पहले इस दरगाह के सज्जादा नासीन बने और तबसे ये परंपरा चली आ रही है की उसी खानदान से इस दरगाह के सज्जादा नशीन बनाये जाते हैं, जो मखदूम साहब के उर्स के मौके पर सारी रस्म अदायगी करते है। इसमें जो सबसे खास पहलू है वह ये है की मखदूम साहब के उर्स के मौके पर सज्जादा नशीन उनका खास कपडा खिरका (हजरत मखदूम अशरफ का पहना हुआ कपड़ा) पहन कर ही उनके आस्ताने पर जाकर लोगों की भलाई के लिए दुआएं मांगता है। इस खिरके की एक झलक पाने और छूने के लिए लोग बेताब रहते हैं। इस मौके पर येहाँ के फकीर भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेतें हैं।