आगरा, बरेली, अलीगढ़, मैनपुरी, बदायूं, कासगंज, शाहजहांपुर, पीलीभीत, एटा के सरकारी प्राइमरी स्कूलों में कम हुए प्रवेश, बीएसए को नोटिस जारी, आगरा में चालू सत्र 2018-19 में 11 हजार बच्चे हुए कम, एक लाख 78 हजार बच्चे आए थे पिछले साल
आगरा। स्कूल चलें हम...सरकार का ये स्लोगन सिर्फ विज्ञापनों तक ही सीमित होकर रह गया है। योगी सरकार ने परिषदीय विद्यालयों के बच्चों को यूनीफॉर्म, किताबें, बस्ता और जूते मोजे बांटने पर भी स्कूलों में बच्चों की संख्या में लगातार गिरावट आई। उत्तर प्रदेश के कई जिलों से करीब 70 हजार से अधिक बच्चे कम हो गए। सरकार ने इस साल इंग्लिश मीडियम स्कूल भी शुरू कराए लेकिन, बावजूद इसके बच्चों की संख्या को नहीं बढ़ा सकी। योगी सरकार ने बच्चों की कम संख्या पर शिक्षा निदेशक द्वारा जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों को नोटिस भेजे गए हैं।
आगरा में इस बार 11 हजार बच्चे हुए कम
आगरा में सत्र 2017-18 में 1,78836 बच्चे थे। लेकिन, 2018-19 सत्र में 1 अगस्त तक 1,67062 बच्चों के एडमीशन ही हो सके। 2017-18 की तुलना में 11,774 बच्चे कम रह गए। बच्चों की कम संख्या पर उत्तर प्रदेश शिक्षा निदेशक बेसिक ने नाराजगी जाहिर की है। सभी शिक्षकों को बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। बात आगरा की करें तो जनपद में 166 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय नगर क्षेत्र में आते हैं। वहीं नगर क्षेत्र में 225 शिक्षक दिए गए हैं। एक स्कूल में विषयों को पढ़ाने के लिए पांच शिक्षकों की जरूरत होती है। लेकिन, शिक्षकों की कमी है।
अन्य जनपदों में भी भारी कमी
परिषदीय विद्यालयों में कमी होने नामांकन कम होने का सिलसिला आगरा साथ अन्य जनपदों में है। अन्य जनपदों में कुछ ऐसे हालात हैं। अलीगढ़ में पिछले सत्र में 1,63617 बच्चे थे, अभी तक 1,57714 बच्चों के नामांकन हुए। करीब 5,903 बच्चे कम रह गए। बरेली में पिछले सत्र में 2,43778 थे जो अब 2,23990 रह गए। करीब 19783 बच्चों के नामांकन कम हुए। बदायूं में पिछले सत्र में 2,38519 बच्चों के नामांकन हुए थे, इस सत्र में 2,32020 नामांकन के साथ 6,499 बच्चे कम रह गए। एटा में पिछले सत्र में 1,13537 नामांकन के बाद नए सत्र में 1,09989 के साथ 3549 बच्चों के कम नामांकन हुए। शाहजहांपुर में 2,52980 नामांकन 2017.18 में हुए थे जो करीब 3,073 घटकर नए सत्र में 2,48907 रह गए। पीलीभीत में पिछले सत्र में 1,26131 नामांकन हुए थे, जो नए सत्र में घटकर 1,17820 के साथ 8511 कम रह गए। मथुरा जनपद में पिछले सत्र में 1,05292 बच्चों के नामांकन हुए थे, इस सत्र में 1,04396 के साथ करीब एक हजार बच्चों के नामांकन कम हुए। मैनपुरी में 1,00954 बच्चों के नामांकन हुए थे, लेकिन, इस सत्र में 8,9516 बच्चों के नामांकन हुए। इस सत्र में 11,433 बच्चों के नामांकन कम हुए। वहीं कासगंज जिले में सत्र 2017.18 में 1,03070 नामांकन हुए थे लेकिन, इस सत्र में 1,00689 नामांकन हुए। यहां भी करीब दो हजार कम नामांकन हुए।
बच्चों के नामांकन कम होने का ये बताया कारण
प्राथमिक शिक्षक संघ के नगर मंत्री राजीव वर्मा से बच्चों की कम संख्या पर जब बात की गई तो उन्होंने बताया कि हर साल बच्चों की रिपोर्ट शासन को भेजी जाती है। जिसमें कितने बच्चों के नामांकन, पास हुए बच्चों की संख्या, स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या आदि का ब्योरा दिया जाता है। सरकार को ये देखना होगा कि एडमीशन प्रक्रिया कम क्यों हुई। सरकार और अधिकारियों की अव्यवस्था लगातार हावी रही है। स्कूलों में स्टॉफ नहीं है, कई विद्यालयों में शौचालय, बिजली नहीं है। पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। बिल्डिंग जर्जर हालत में है। आगरा के जगदीशपुरा में खुले आसमान के नीचे शिक्षा लेने के लिए छात्र मजबूर हैं। स्कूलों में समय से किताबें नहीं मिल रही हैं। ये कारण बच्चों को स्कूल से दूर करने के पीछे हो सकते हैं। शिक्षक लगातार मेहनत करते हैं, हर साल रैली निकाली जाती है, अभिभावकों के साथ मीटिंग की जाती है। लेकिन, जब अभिभावक देखता है कि बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ रहे हैं तो बच्चों की संख्या घटना स्वभाविक है।
कई अन्य कार्यों में फंसे रहते हैं शिक्षक
निधि श्रीवास्तव, संयुक्त मंत्री प्राथमिक शिक्षक संघ आगरा का कहना है कि अधिकांश स्कूल एक अध्यापक ही चला रहे हैं। शिक्षकों की लगातार कमी है। एक शिक्षक होने के बावजूद भी उस पर कई सारे काम होते हैं। शिक्षक को ही मिड डेमील बनवाना है। किताबें भी लानी है, ड्रेस भी लानी है। वहीं अतिरिक्त कार्यों में भी लगाया जाता है। बीएलओ जैसी ड्यूटी लगाई जाती है। शासन द्वारा सुबह से शाम तक कई सारे अन्य कामों का ब्यौरा मांगा जाता है। वहीं दूसरा कारण है कि सरकार ने हर गली में स्कूलों को मान्यता दे दी है। गली गली में मान्यता प्राप्त विद्यालय है। हालांकि वहां प्रशिक्षित स्टॉफ नहीं है लेकिन, अन्य सुविधाएं दी जा रही है। फर्नीचर, बिजली की व्यवस्था हैं। ऐसे में प्राथमिक विद्यालयों में अभिभावक बच्चों को नहीं भेजते हैं।