ऐसी न शब-ए-बरात न बकरीद की खुशी जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी
आगरा। जनकवि नजीर अकबराबादी का नाम कौन नहीं जानता। अपने जामाने के मस्तमौला शायर। दीवाली, होली, श्रीकृष्ण, रोटी, मुफलिसी, तैराकी मेला, ईद आदि पर नज्में लिखी हैं। उनका जन्म दिल्ली में 1735 में हुआ था। फिर वे आगरा आ गए। ताजमहल के पास जिस मोहल्ले में रहे, उसे नजीर पार्क के नाम से जाना जाता है। उनका निधन आगरा में ही 16 अगस्त, 1830 को हुआ। आगरा में ताजमहल के पास उनकी मजार है, जिसे नजीर पार्क कहा जाता है। आज विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर ईद है। नजीर अकबराबादी की एक नज्म हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।
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क्यों हुए लोकप्रिय
यह नज्म हमें मिली है शायर अमीर अहमद एडवोकेट से। उन्होंने बताया कि नजीर अकबराबादी का असली माम सैयद वली मुहम्मद है। नजीर ने कबूतरबाजी, पतंगबाजी पर भी नज्में लिखी हैं। उन्होंने जनता की बात जनता की भाषा में लिखी। इसी कारण आज भी लोकप्रिय हैं। उनकी तमाम नज्मों पर रंगमंच फिदा हो गया। नजीर इसलिए लोकप्रिय हुए क्योंकि उन्होंने अपने आसपास बिखरे जिन्दगी के रंगों को शायरी का विषय बनाया।
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है आबिदों को त‘अत-ओ-तजरीद की खुशी
और ज़ाहिदों को जुहाद की तमहीद की खुशी
रिन्द आशिकों को है कई उम्मीद की खुशी
कुछ दिलबरों के वल की कुछ दीद की खुशी
ऐसी न शब-ए-बरात न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी
पिछले पहर से उठ के नहाने की धूम है
शीर-ओ-शकर सिवईयाँ पकाने की धूम है
पीर-ओ-जवान को नेम‘तें खाने की धूम है
लड़कों को ईद-गाह के जाने की धूम है
ऐसी न शब-ए-बरात न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी
कोई तो मस्त फिरता है जाम-ए-शराब से
कोई पुकारता है कि छूटे अज़ाब से
कल्ला किसी का फूला है लड्डू की चाब से
चटकारें जी में भरते हैं नान-ओ-कबाब से
ऐसी न शब-ए-बरात न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी
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क्या है मुआन्क़े की मची है उलट पलट
मिलते हैं दौड़ दौड़ के बाहम झपट झपट
फिरते हैं दिल-बरों के भी गलियों में गट के गट
आशिक मज़े उड़ाते हैं हर दम लिपट लिपट
ऐसी न शब-ए-बरात न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी
रोज़े की ख़ुश्कियों से जो हैं ज़र्द ज़र्द गाल
ख़ुश हो गये वो देखते ही ईद का हिलाल
पोशाकें तन में ज़र्द, सुनहरी सफेद लाल
दिल क्या कि हँस रहा है पड़ा तन का बाल बाल
ऐसी न शब-ए-बरात न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी
जो जो कि उन के हुस्न की रखते हैं दिल से चाह
जाते हैं उन के साथ ता बा-ईद-गाह
तोपों के शोर और दोगानों की रस्म-ओ-राह
मयाने, खिलोने, सैर, मज़े, ऐश, वाह-वाह
ऐसी न शब-ए-बरात न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी
रोज़ों की सख़्तियों में न होते अगर अमीर
तो ऐसी ईद की न ख़ुशी होती दिल-पज़ीर
सब शाद हैं गदा से लगा शाह ता वज़ीर
देखा जो हम ने ख़ूब तो सच है मियां ‘नज़ीर‘
ऐसी न शब-ए-बरात न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की खुशी
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