
आचार्य रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद के बीच गुरु-शिष्य परंपरा का जो दर्शन था, वह बहुत कम जगहों पर देखने को मिलता है। अगर आचार्य महान गुरु थे, तो इसमें कोई दो राय नहीं कि विवेकानंद भी महान शिष्य थे। दोनों के संबंध में गौर करने वाली बात यह थी कि परमहंस जानते थे, शिष्य को कैसे मांजा जाता है। इसके लिए अक्सर रामकृष्ण विवेकानंद से सवाल पूछते, फिर उन्हें सही उत्तर देते। कोई उलझाने वाली समस्या बताते, जिससे निकलने का रास्ता वह उनसे पूछते और जब विवेकानंद उस सवाल में उलझ जाते तो परमहंस उनको रास्ता सुझाते।
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इस तरह से उन्होंने अपने शिष्य को हर प्रकार से खूब तपाया और पकाया। फिर जब वह चमका तो दुनिया ने उसकी चमक देखी। ऐसे ही एक रोज विवेकानंद से आचार्य ने पूछा, ‘नरेंद्र, एक पल के लिए कल्पना करो कि तुम एक मक्खी हो और सामने रखे इस प्याले में अमृत भरा हुआ है। अब तुम इसके किनारे बैठकर इसे धीरे-धीरे स्पर्श करोगे या तुरंत उसमें बीच में कूद जाओगे?’ आचार्य के सवाल का उत्तर देते हुए विवेकानंद बोले, ‘मैं इसे किनारे से धीरे-धीरे स्पर्श करूंगा, क्योंकि बीच में कूद जाने से जीवन का अस्तित्व ही संकट में आ जाएगा।’
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नरेंद्र का इतना कहना था कि उसके साथी उसकी पीठ थपथपाने लगे। सब कहने लगे कि उसने समझदारी वाला उत्तर दिया, मगर रामकृष्ण परमहंस क्रोधित होकर बोल पड़े, ‘मूर्ख, जिसके स्पर्श से तू अमरता की कल्पना करता है, उसके बीच में भी कूद कर तुझे मृत्यु का भय आता है? जिसके स्पर्श मात्र से तू अमर होने की चाहत रखता है, उसके बीच में डूबते हुए डरता है? यह बात तुम सभी लोग गांठ बांध लो, चाहे भौतिक उन्नति हो या आध्यात्मिक, जब तक उसके लिए मिटने की हद तक का संपूर्ण समर्पण नहीं होता, सफलता नहीं मिलती।’
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