
Happy Birthday Modi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर उनके बचपन के सहपाठी और बीएसएनएल से सेवानिवृत्त जमीयत उलेमा-ए-हिंद की मेहसाणा इकाई के सदर दौलत खान पठान ने उनसे जुड़ी कई पुरानी यादें साझा कीं। पठान ने वडनगर में मोदी के साथ बिताए बचपन के दिनों से लेकर स्कूल, आरएसएस से जुड़ने और सामाजिक सेवा तक के कई प्रसंग बताए। दौलत खान पठान वडनगर के पठान मोहल्ले में रहते थे, जहां करीब 250 से 300 घर थे। उन्होंने बताया कि वह प्रेरणा स्कूल में कक्षा 4 से 7 तक नरेंद्र मोदी के साथ पढ़े। दोनों के बीच बचपन से ही गहरी दोस्ती थी और स्कूल के दिनों में वे पढ़ाई के साथ-साथ वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेते थे।
1961 की एक घटना को याद करते हुए पठान ने बताया कि वह और नरेंद्र मोदी डॉ. वसंत पारिख के मार्गदर्शन में आरएसएस से जुड़ना चाहते थे। इसके लिए एक रुपए की फीस देनी थी, लेकिन दोनों के पास पैसे नहीं थे। नरेंद्र मोदी खुद पठान के घर गए और उनकी मां से एक रुपया देने के लिए कहा। वहीं पठान मोदी की मां हीराबा के पास पहुंचे और उनसे एक रुपया लिया। इसके बाद दोनों का पंजीकरण हो गया। कई दशक बाद वर्ष 2009 में गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय में हुई एक बैठक के दौरान नरेंद्र मोदी ने पठान के साथ बचपन की इन यादों को फिर से साझा किया। पठान के मुताबिक, मोदी ने मजाक में उनके रिटायरमेंट के समय उन्हें 'आधा गुजरात' देने की बात भी कही थी। हालांकि, परिवार की जिम्मेदारियों के कारण पठान सक्रिय राजनीति में शामिल नहीं हो सके।
पठान ने बताया कि हाई स्कूल के दौरान दोनों की दोस्ती और मजबूत हुई। पढ़ाई के साथ दोनों हर सप्ताह बुधवार को होने वाली वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते थे और कई बार शीर्ष स्थान हासिल करते थे। वर्ष 1965 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता से जुड़े एक वाद-विवाद के बाद पठान ने नरेंद्र मोदी को नियमित रूप से अखबार पढ़ने के लिए पुस्तकालय जाने के लिए प्रेरित किया। इसी दौर में डॉ. वसंत पारिख ने नरेंद्र मोदी और आरएसएस से जुड़े अन्य युवाओं को सामुदायिक सेवा के लिए प्रेरित किया। इसके बाद वे चंपा, नवापुरा और सुल्तानपुरा जैसे सूखाग्रस्त गांवों में जरूरतमंद लोगों तक रियायती दर पर बाजरा पहुंचाने का काम करते थे। पठान के अनुसार, उस समय पांच किलो बाजरा दो रुपए में मिलता था और युवा कार्यकर्ता उसके भारी बोरे गांवों तक पहुंचाते थे।
पठान ने नरेंद्र मोदी के परिवार की आर्थिक स्थिति को भी याद किया। उन्होंने बताया कि मोदी के घर में काफी गरीबी थी। उनकी मां हीराबा कुएं से पानी निकालने और बर्तन धोने जैसे काम करके एक बर्तन के लिए एक आना कमाती थीं। इन परिस्थितियों का नरेंद्र मोदी के जीवन और समाजसेवा के प्रति उनके नजरिए पर गहरा प्रभाव पड़ा। पठान के मुताबिक, डॉ. वसंत पारिख और आरएसएस के सेवा भाव से प्रभावित होकर नरेंद्र मोदी ने अपना जीवन समाज और देश की सेवा के लिए समर्पित करने का फैसला किया। उन्होंने शादी नहीं करने का निर्णय लिया और करीब तीन साल तक साधु के रूप में देश के अलग-अलग हिस्सों में घूमते रहे। इस दौरान उन्होंने भिक्षा पर जीवन बिताया।
वर्ष 1971 में गुजरात लौटने के बाद नरेंद्र मोदी अहमदाबाद के खाड़िया स्थित आरएसएस कार्यालय में रहने लगे। वर्ष 1975 में आपातकाल के दौरान उन्होंने जेल में बंद विपक्षी नेताओं के परिवारों और उनसे जुड़े लोगों की मदद की। इसी दौर में उन्होंने अपनी पहली किताब 'संघर्ष मा गुजरात' लिखी। वर्ष 1977 की मोरबी बाढ़ के दौरान राहत कार्यों में मिले सोने के आभूषण पुलिस को सौंपने की घटना का भी पठान ने उल्लेख किया। पठान ने बताया कि नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक जीवन में आगे बढ़ने के दौरान सार्वजनिक जिम्मेदारियों और पारिवारिक मामलों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखा।
उन्होंने वर्ष 1990 की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि अपने बड़े भाई सोमभाई का तबादला रद्द कराने के लिए मोदी तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अशोक भट्ट से भी भिड़ गए थे। पठान के अनुसार, आज वडनगर में काफी विकास हुआ है, लेकिन नरेंद्र मोदी ने अपने गृह नगर तक सीमित रहने के बजाय पूरे गुजरात और बाद में पूरे देश को एक समान नजर से देखा। बचपन के सहपाठी के रूप में पठान के पास प्रधानमंत्री मोदी से जुड़ी कई ऐसी यादें हैं, जो उनके शुरुआती जीवन और संघर्ष के दौर की झलक देती हैं।