
अजमेर। चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बावजूद भाजपा ने नगर निगम में कब्जा बरकरार रखा। कांग्रेस 36 साल बाद भी भाजपा के मजबूत किले को नहीं ढहा सकी। भाजपा बहुमत के जादुई 41 के आंकड़े तक पहुंच गई। साथ ही दो वोट ज्यादा हासिल कर कांग्रेस को चारों खाने चित्त कर दिया। भाजपा 80 में से 32 और कांग्रेस 37 वार्ड जीत सकी थी। जनता ने दोनों दलों को पूर्ण बहुमत नहीं दिया। निर्दलीय और बागी 11 वार्ड जीतने में सफल रहे। सत्ता की चाबी निर्दलीयों के हाथों में आते ही भाजपा सक्रिय हो गई।
1990 से लगातार अजमेर नगर निगम में पराजय झेल रही कांग्रेस ने इस बार बेहतरीन प्रदर्शन से सबको चौंका दिया था। भाजपा बहुमत से पिछड़ गई। 32 सीट जीतने के बावजूद भाजपा ने योजनाबद्ध तरीके से काम किया। सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले के अलावा पार्टी के बड़े नेताओं को निर्दलीयाें को साधने की जिम्मेदारी सौंपी गई। दो निर्दलीय मुस्लिम पार्षदों को भी टटोला गया।
11 निर्दलीयों में से करीब सात भाजपा के ही बागी थे। लिहाजा भाजपा ने सबसे पहले उन्हें कैंप में शामिल किया। इसके बाद चार अन्य निर्दलीय पार्षदों की अंदरूनी स्कैनिंग की गई। इन्हें पूरी तरह साधने के बावजूद क्रॉस वोटिंग की आशंका बनी रही।
नगर निगम के 80 वार्डों के नतीजे सामने आने के बाद अब भाजपा ने पार्षदों को बाड़ाबंदी में रखा। एक-एक पार्षद से व्यक्तिगत बातचीत की गई। भाजपा समर्थित कई निर्दलीय खुद ही खेमे में पहुंच गए। बागियों को पार्टी में वापस लेने का आश्वासन दिया गया। कांग्रेस समर्थित निर्दलीयों को पाले में लाने के लिए सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले पर भी फोकस किया गया।
भाजपा का बोर्ड बनाने और महापौर निर्वाचन तक विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने अहम योगदान दिया। उनकी अगुवाई में ही नगर निगम को साधने की रणनीति तैयार हुई। इसके चलते भाजपा 8 निर्दलीय और कांग्रेस समर्थित तीन पार्षदों को अपने पक्ष में कर पाई। खासतौर पर वार्ड 3 और 4 तो देवनानी के लिए प्रतिष्ठा के सवाल थे। उन्होंने ब्लॉक से लेकर मंडल तक नजर बनाए रखी। इसके बूते भाजपा ने बोर्ड बना लिया।