
अलवर शहर को साफ रखने की जिम्मेदारी जिन सफाईकर्मियों पर है, उनके पास कचरा उठाने के लिए हाथ गाड़ी तक नहीं है। मजबूरी में कर्मचारी कट्टों में कचरा भरकर उसे घसीटते हैं और एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं। दूसरी ओर नगर निगम के पुराने सूचना केंद्र में हाथ गाड़ियां बड़ी संख्या में रखी हैं, लेकिन जरूरतमंद कर्मचारियों तक ये संसाधन नहीं पहुंच रहे। यह तस्वीर नगर निगम की सफाई व्यवस्था और संसाधनों के प्रबंधन पर सवाल खड़े करती है।
दिवाली का सीजन है। शहर में सामान्य दिनों की तुलना में डेढ़ गुना तक ज्यादा कचरा निकल रहा है। ऐसे में सफाई कर्मियों पर काम का दबाव बढ़ गया है, लेकिन संसाधनों की कमी उनकी परेशानी और बढ़ा रही है। जिन हाथ गाड़ियों से कचरे का परिवहन आसानी से हो सकता है, वे गैराज में खड़ी जंग खा रही हैं और कर्मचारी कट्टों के सहारे कचरा ढोने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि जब निगम के पास हाथ गाड़ियां उपलब्ध हैं, तो उन्हें सफाई कर्मियों को सौंपने में देरी क्यों हो रही है? इस देरी का खामियाजा शहरवासियों को भुगतना पड़ रहा है।
अलवर शहर की सफाई व्यवस्था में संसाधनों की उपलब्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी उनका सही इस्तेमाल भी है। हाथ गाड़ी होने से कर्मचारी कचरे को आसानी से एकत्र कर निर्धारित स्थान तक पहुंचा सकते हैं। इससे समय और श्रम दोनों की बचत होगी। इसके उलट कट्टों में कचरा भरकर घसीटने से कर्मचारियों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। दिवाली जैसे व्यस्त सीजन में यह स्थिति सफाई कार्य की गति को भी प्रभावित कर सकती है। हाथ गाड़ियों को जरूरत के अनुसार सफाईकर्मियों तक पहुंचाया जाए तो कचरा उठाने और उसे निर्धारित स्थान तक ले जाने में सहूलियत हो सकती है।
बाजारों में रात के समय सफाई कराई जाती है। कर्मचारी एक साथ जुटकर कचरा उठाते हैं, ताकि सुबह दुकानें खुलने और लोगों की आवाजाही शुरू होने से पहले बाजार साफ नजर आएं। त्योहार के दौरान बाजारों में कचरा बढ़ने से इस काम की चुनौती भी बढ़ गई है। ऐसे समय में कर्मचारियों को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना निगम की प्राथमिकता होनी चाहिए। ताकि शहर की सफाई व्यवस्था प्रभावित नहीं हो।