
अलवर में तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती में ज्यादा अंक हासिल करने के बावजूद अभ्यर्थी को नियुक्ति से वंचित कर दिया गया, जबकि कम अंक वाले अभ्यर्थी को नौकरी मिल गई। इसका खुलासा राज्य स्तरीय जांच में हुआ है। मामले में योगेंद्री यादव को निर्धारित योग्यता और ज्यादा अंक होने के बावजूद नियुक्ति से वंचित कर दिया गया। वहीं, उनसे कम अंक हासिल करने वाले अभ्यर्थी को नौकरी मिल गई। राज्य स्तरीय जांच में दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया से जुड़ी गड़बड़ी सामने आई और दो अधिकारियों की भूमिका पर जिम्मेदारी तय की गई। इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई अब तक पूरी नहीं हुई है।
योगेंद्री यादव तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती-2013 के लेवल प्रथम की अभ्यर्थी थीं। उनके पास स्नातक की डिग्री के साथ प्रारंभिक शिक्षा में दो वर्षीय डिप्लोमा भी था। भर्ती विज्ञप्ति में तय शर्तों के मुताबिक वह नियुक्ति के लिए पात्र थीं। इसके बावजूद अधिक अंक होने पर भी उन्हें नौकरी नहीं मिली। दूसरी ओर, उनसे कम अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी को नियुक्ति दे दी गई।
अपने साथ हुई इस अनियमितता के खिलाफ योगेंद्री यादव ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के बाद न्यायालय ने उन्हें नियुक्ति देने के निर्देश दिए। हालांकि, उस समय विभाग के पास नियुक्ति देने के लिए रिक्त पद उपलब्ध नहीं था। ऐसे में मामला आगे बढ़ा और नियुक्ति में देरी को लेकर अवमानना की स्थिति बन गई।
न्यायालय के निर्देशों की पालना के लिए शिक्षा विभाग ने अतिरिक्त छाया पद स्वीकृत कराने की प्रक्रिया अपनाई। प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के बाद योगेंद्री यादव को नियुक्ति दे दी गई। इस तरह जिस अभ्यर्थी को भर्ती प्रक्रिया के दौरान नियुक्ति मिलनी चाहिए थी, उसे अपना हक पाने के लिए न्यायालय का सहारा लेना पड़ा। मामले में छाया पद की व्यवस्था भी करनी पड़ी।
मामले की राज्य स्तरीय जांच में दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया में अनियमितता का उल्लेख किया गया। जांच में तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी प्रारंभिक शिक्षा दीपचंद बुनकर और दस्तावेज सत्यापन दल के संयोजक एवं तत्कालीन ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, पंचायत समिति उमरैण भजनलाल की भूमिका की पड़ताल की गई। उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक, दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के प्रस्ताव भेजे गए थे।
मामले में अभ्यर्थी को न्यायालय के आदेश के बाद नियुक्ति तो मिल गई, लेकिन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का मामला अब तक लंबित है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब जांच में अधिकारियों की भूमिका सामने आ चुकी है और कार्रवाई के प्रस्ताव भी भेजे जा चुके हैं, तो विभागीय कार्रवाई पूरी क्यों नहीं हुई? भर्ती प्रक्रिया में हुई इस गड़बड़ी ने पात्र अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।