
अलवर जिला परिषद अलवर की लिपिक भर्ती में कई चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। राज्य स्तरीय जांच में सामने आया है कि करीब 13 साल तक चली इस भर्ती प्रक्रिया में कुल 655 अभ्यर्थियों को लिपिक पद पर नियुक्तियां दी गईं, लेकिन किसी भी अभ्यर्थी के दस्तावेजों का सत्यापन ही नहीं कराया गया। हैरान करने वाली बात यह है कि यह पूरी भर्ती दस्तावेजों के आधार पर हुई थी। इसमें न कोई लिखित परीक्षा आयोजित हुई और न ही कोई साक्षात्कार लिया गया।
जांच दल के अध्यक्ष अनिल सोनी ने अपनी रिपोर्ट में दस्तावेज सत्यापन नहीं कराने को रेखांकित करते हुए इसे लगभग उसी स्थिति के समान बताया है जैसे बिना कॉपियां जांचे पूरे अंक देना। यानी जिस भर्ती में अभ्यर्थी की योग्यता और पात्रता का निर्धारण ही उसके दस्तावेजों के आधार पर होना था, उसी भर्ती में दस्तावेजों की प्रमाणिकता और पात्रता की जांच नहीं की गई।
जांच में दस्तावेज सत्यापन की व्यवस्था में तीन स्तरों पर गंभीर चूक सामने आई है। पहला, अलवर जिला परिषद की भर्ती सेल का। 13 वर्षों तक भर्ती प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और कार्मिकों के स्तर पर अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन नहीं किया गया। दूसरे स्तर पर जिन पंचायत समितियों में इन लिपिकों को नियुक्ति मिली, वहां संबंधित विकास अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। पंचायत समितियों में कार्यरत कर्मचारियों के दस्तावेजों का भी आवश्यक स्तर पर सत्यापन नहीं कराया गया। तीसरे स्तर पर जिला परिषद में नियुक्त हुए लिपिकों के दस्तावेजों का सत्यापन मुख्य कार्यकारी अधिकारी के स्तर पर भी नहीं कराया गया।
दस्तावेज सत्यापन दल ने भर्ती से संबंधित परिपत्रों और नियमों का पूरी तरह अध्ययन नहीं किया। यदि संबंधित परिपत्रों का गंभीरता से अध्ययन किया जाता और उसके अनुसार दस्तावेजों की जांच होती, तो कई अपात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिलने से पहले ही रोका जा सकता था।
भर्ती शाखा की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। दस्तावेज सत्यापन दल की ओर से अभ्यर्थियों के दस्तावेजों पर आपत्तियां मिलने के बावजूद उनका निस्तारण कराए बिना ही नियुक्तियां दे दी गईं। वर्ष 2022 में तो 50 से अधिक अभ्यर्थियों की दस्तावेज सत्यापन चेकलिस्ट पर सत्यापन दल ने आपत्तियां दर्ज की थीं। इसके बावजूद भर्ती शाखा की ओर से लाल पेन से अपनी टिप्पणियां दर्ज कर अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई। जांच का अहम बिंदु यह है कि इन आपत्तियों का विधिवत निराकरण तक नहीं कराया गया।
वर्ष 2013 में जिन कई अभ्यर्थियों को दस्तावेज सत्यापन के दौरान अपात्र माना गया था, उनकी चेकलिस्ट बाद के वर्षों में बदलकर वर्ष 2018 और 2022 में उन्हें नियुक्तियां दिए जाने के आरोप सामने आए। खास बात यह है कि वर्ष 2013 में संबंधित दस्तावेज सत्यापन दल और तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी की ओर से भी इन अभ्यर्थियों के पात्र नहीं होने संबंधी टिप्पणियां की गई थीं। इसके बावजूद बाद में उन्हीं मामलों में परिस्थितियां बदलती दिखाई दीं और अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिल गई।