अलवर

#sehatsudharosarkar Video : राजस्थान के इस जिले में मुख्यालय को छोड़ कहीं भी बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्थाएं नहीं, सड़कों पर होते हैं प्रसव

जिला मुख्यालय को छोड़कर किसी भी जगह बेहतर व्यवस्थाएं नहीं है। आए दिन सड़क व वाहनों में प्रसव होने की घटनाएं हो रही हैं।

3 min read
Sep 18, 2017
delivery on Roads in alwar

अलवर.

जिले में प्रसूता व नवजात के साथ खिलवाड़ हो रहा है। जिले में महिला रोग विशेषज्ञ व शिशु रोग विशेषज्ञ की कमी है। जिला मुख्यालय को छोड़कर किसी भी जगह बेहतर व्यवस्थाएं नहीं है। आए दिन सड़क व वाहनों में प्रसव होने की घटनाएं हो रही हैं। जन्म के तुरंत बाद नवजात को इलाज नहीं मिलता है। इसलिए जिले में हर साल नवजात की मौत होती है। जन्म के तुरंत बाद एक हजार बच्चों में से 56 बच्चों की मौत हो जाती है। इससे जिले के हालात की कल्पना की जा सकती है।

ये भी पढ़ें

Video : सांसद बने महंत चांदनाथ : वोट देने की उम्र में योगी और सफर रहा सांसद तक का

जिले में ३६ सीएचसी, १२२ पीएचसी, एक जनाना अस्पताल, एक शिशु अस्पताल व एक सैटेलाइट अस्पताल है। गीतानंद शिशु अस्पताल आज भी कागजों में एक वार्ड है। इसमें ९ शिशु रोग विशेषज्ञ हैं, लेकिन आउट डोर में दो डॉक्टर रहते हैं। बच्चे का इलाज कराने में तीन घंटे तक का समय लग जाता है। अस्पताल में जांच व रात के समय इलाज की कोई सुविधा नहीं है। अलवर में प्रदेश की पहली एफबीएनसी यूनिट हैं, लेकिन उसमें आज भी ऑक्सीजन नहीं है।

जनाना अस्पताल के हालात भी खराब हैं। अस्पताल में प्रतिदिन ५० प्रसव होते हैं। एक बेड पर दो से तीन प्रसूताएं लेटी रहती हैं। अस्पताल में सुविधाओं के नाम पर कोई इंतजाम नहीं है। प्रसूता व उसके परिजन इलाज के लिए परेशान होते हैं। आए दिन अस्पताल में विवाद होता है। अस्पताल में नवजात भी सुरक्षित नहीं है। अस्पताल में बिल्ली व चूहों से बच्चों को खतरा रहता है। प्रसूताओं को घर से पंखा लाना पड़ता है। पीने के लिए पानी व शौचालय के भी पर्याप्त इंतजाम नहीं है।

ग्रामीण क्षेत्रों की नवजात यूनिट में नहीं हैं इंतजाम


तय समय से पहले होने वाले बच्चे, कमजोर बच्चे व किसी भी बीमारी से पीडि़त बच्चों को जन्म के तुरंत बाद नवजात यूनिट में रखा जाता है। जिले में एफबीएनसी यूनिट है, जबकि सीएचसी स्तर पर छोटी यूनिट बनी हुई है। यह यूनिट केवल कागजों में चल रही है। नवजात को इस यूनिट से कोई फायदा नहीं मिल रहा है।

अस्पताल में नहीं हैं सुविधाएं


हरसौली कस्बे में स्वास्थ केन्द्र पर चिकित्सकों की छह पद है, लेकिन उपलब्ध तीन चिकित्सकों से ही संतुष्ठ कस्बेवासियों का कहना है कि प्राथमिक स्वास्थ केन्द्र से सामुदायिक में क्रमोन्नत होने पर विभाग की ओर से सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं दिया। अस्पताल में पंखे, लेबर टेबल (डिलीवरी), व्हीलचैयर, स्टेचर, फर्नीचर आदि सामान कस्बे के भामाशाहों की ओर दिया गया। प्रतिदिन 300 ओपीडी व महीने में औसतन 30 डिलीवरी के मामले आ रहे हंै। चिकित्सालय में पेयजल के लिए बनाई बोरिंग में बरसात का पानी चले जाने के कारण शौचालय व पेड़-पौधों के लिए पानी के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

जिले में निजी अस्पतालों का कब्ज


प्रत्येक मोहल्ले व कॉलोनी में महिला अस्पताल खुले हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्र में चल रहे अस्पतालों पर स्वास्थ्य विभाग व जिला प्रशासन को कोई इंतजाम नहीं है। बेहतर सेवाएं नहीं मिलने से अस्पतालों मंे आए दिन प्रसूताओं की मौत हो जाती है। समय समय पर अस्पतालों की जांच भी नहीं होती है।

रात में नहीं होते हैं प्रसव


राजगढ़ कस्बे के महिला चिकित्सालय में रात को महिला चिकित्सक के नहीं होने के कारण डिलीवरी के लिए आने वाली महिलाओं को परेशानी होती है। चिकित्सालय में केवल एक जच्चा-बच्चा वार्ड बना हुआ है। करीब दस से पन्द्रह महिलाएं प्रतिदिन डिलीवरी कराने आती हंै। बेड कम होने के कारण जच्चा-बच्चा को बच्चों के वार्ड में भर्ती करना पड़ता है। इससे महिला व उसके नवजात बच्चे को परेशानी उठानी पड़ रही हैं। चिकित्सालय की ऊपर की मंजिल पर करीब पचास लाख रुपए की लागत से बना वार्ड हैंडओवर नहीं होने के कारण करीब आठ वर्षों से बंद पड़ा हुआ है। सोनोग्राफी मशीन होने के बाद भी सप्ताह में एक दिन सोनोग्राफी होती है।

ये भी पढ़ें

#sehatsudharosarkar घर में थाली बजानी है तो सुविधा शुल्क देना होगा
Published on:
18 Sept 2017 07:06 am
Also Read
View All