
Ashoknagar Momina Gauri struggle: जिंदगी में मुश्किलें जब रास्ता रोकती है, तो लोग हार मान लेते हैं या भाग्य को कोसने लगते है। लेकिन अशोकनगर के चंदेरी की मोमिना गौरी की कहानी इसके उलट है। शारीरिक विकलांगता व बचपन की घोर गरीबी भी उनके हौसलों को डिगा नहीं सकी। पिछले 26 वर्षों से यह शिक्षिका हर दिन 7 किमी का फासला तय कर बच्चों के हाथों में शिक्षा की कलम थमा रही है। यह कहानी सिर्फ एक सरकारी कर्मचारी के संघर्ष की नहीं, बल्कि उस अदम्य इच्छाशक्ति की मिसाल है, जिसके आगे हर शारीरिक चुनौती बौनी साबित हो गई।
चंदेरी की बुनकर कॉलोनी निवासी मोमिना गौरी का बचपन एक मजदूर परिवार के आर्थिक संकटों के बीच बीता। अभावों ने उन्हें बहुत करीब से देखा, लेकिन मोमिना ने परिस्थितियों को अपनी नियति मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने अपनी कमजोरी को ताकत बनाया, शिक्षा को हथियार चुना और कड़ी मेहनत के दम पर 7 जनवरी 1999 को प्राथमिक शिक्षिका की नौकरी हासिल की। ग्रामीण क्षेत्र कुंवरपुर से अपनी सेवा शुरु करने वाली मोमिना ने अपनी सफलता से न सिर्फ जीवन को नई दिशा दी, बल्कि परिवार को भी आर्थिक तंगी से उबार लिया।
मोमिना गौरी का जीवन आज उन हजारों महिलाओं के लिए एक मूक संदेश है, जो आर्थिक तंगी, शारीरिक अक्षमता या पारिवारिक बोझ के चलते अपने सपनों से समझौता कर लेती है। मोमिना ने यह साबित कर दिया है कि शारीरिक अक्षमता इंसान के कदमों की रफ्तार जरूर धीमी कर सकती है, लेकिन अगर संकल्प मजबूत हो तो मंजिल तक पहुंचने का रास्ता अपने-आप बन जाता है।
पहुंचकर बच्चों को पढ़ाना और फिर घर आकर एक जिम्मेदार गृहिणी की तरह परिवार एक सामान्य इंसान के लिए भी रोज कई किमी का सफर थका देने वाला होता है, लेकिन दिव्यांग मोमिना बीते 26 वर्षों से हर दिन करीब 7 किमी दूर स्कूल पहुंच रही हैं। स्कूल संभालना, उन्होंने दोनों मोचर्चों पर खुद को साबित किया। बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने अपनी मेहनत में कमी नहीं आने दी।
मोमिना गौरी के इसी कर्तव्यनिष्ठा को शिक्षा विभाग ने भी सलाम किया। सेवाओं को देखते हुए विभाग ने उनके नाम की अनुशंसा जिला प्रशासन से की थी। कलेक्टर ने 26 जनवरी को मोमिना को उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया। यह केवल एक शिक्षिका का सम्मान नहीं था, बल्कि परिस्थितियों से लड़कर जीतने वाले जज्बे का सार्वजनिक अभिनंदन था।