
Marriage Ban in MP Villages: शादी-ब्याह का नाम सुनते ही ढोल-नगाड़े, शहनाई की गूंज और गांवभर की रौनक जेहन में तैरने लगती है। लेकिन, शहर से ही सटे टकनेरी गांव में पिछले डेढ़ साल से एक अजीब सा सन्नाटा है। गांव में किसी भी बेटी की डोली उसके अपने आंगन से नहीं उठ रही है। वजह कोई आर्थिक तंगी या महामारी नहीं, बल्कि एक ऐसी अजीबोगरीब और रूढि़वादी परंपरा है, जिसने पूरे गांव की खुशियों पर अघोषित कर्फ्यू लगा दिया है। दरअसल, परंपरा यह है कि यदि गांव में कोई हत्या या अप्रिय घटना हो जाए, तो वहां तब तक कोई मांगलिक कार्य नहीं हो सकता, जब तक कि आरोपी पक्ष के परिवार में कोई शादी न हो जाए। डेढ़ साल पहले गांव में एक महिला की हत्या हुई, पूरे गांव में शहनाई बजना ही (Marriage Ban Takneri Village) बंद हो गई।
ब्राह्मण, रघुवंशी, यादव, अहिरवार समाज के लोग तो रहते ही हैं, आदिवासी बाहुल्य इस गांव में यह परंपरा बड़ी सामाजिक समस्या बन चुकी है। संपन्न परिवार तो शहर में मैरिज गार्डन या हॉल बुक कर लेते हैं। मुसीबत उन गरीब परिवारों (Marriage Ban after murder) की है, जिनके पास न तो मैरिज गार्डन बुक करने के पैसे हैं और न ही बाहर मेहमानों को ठहराने की व्यवस्था। तो इन परिवारों को गांव की सीमा से बाहर जाकर विवाह के आयोजन करने पड़ रहे हैं।
इस परंपरा की सबसे ताजा कहानी मेहरबान सिंह के परिवार की है। सोमवार को मेहरबान सिंह की बेटी की शादी थी। अरमान थे कि बेटी को अपने ही आंगन से विदा करेंगे, लेकिन गांव की इस परंपरा के आगे भावनाएं हार (Marriage Ban poor people families) गईं। मजबूरी में उन्हें गांव की सीमा लांघकर पंवारगढ़ में जाकर बेटी के हाथ पीले करने पड़े। इस सीजन में गांव के करीब 9 से 10 परिवारों ने इसी तरह गांव से बाहर जाकर अपने बच्चों की शादियां की हैं।
यह विडंबना सिर्फ टकनेरी गांव की ही नहीं है। बल्कि ऐसे छोटे-बड़े करीब एक हजार गांवों वाले जिले में 100 से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जो ऐसी परंपरा का दंश झेल रहे (Marriage Ban after murder) हैं। इन गांवों में बरसों से शहनाई नहीं बजी है। कोई भी अप्रिय घटना होने के बाद गांव वाले अपने ही बच्चों की शादी के लिए दूसरे गांवों, शहरों और धर्मशालाओं में भटकने को मजबूर हैं।