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Nirjala Ekadashi 2026: निर्जला एकादशी पर लक्ष्मी नारायण राजयोग, इन 4 राशियों को मिल सकता है धन और करियर में लाभ

Nirjala Ekadashi Shubh Muhurat: ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी 2026 इस बार लक्ष्मी नारायण राजयोग के दुर्लभ संयोग के साथ आ रही है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, वृषभ, कर्क, तुला और मीन राशि के जातकों को धन, करियर और व्यापार में विशेष लाभ मिलने की संभावना है।

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Jun 23, 2026
Nirjala Ekadashi Lakshmi Narayan Rajyog
Nirjala Ekadashi Lakshmi Narayan Rajyog : राशियों पर लक्ष्मी नारायण योग का प्रभाव (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Nirjala Ekadashi Vrat, Lakshmi Narayan Rajyog: ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी इस बार विशेष ज्योतिषीय संयोग के साथ आ रही है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 25 जून को पड़ने वाले इस व्रत पर बुध और शुक्र की युति से लक्ष्मी नारायण राजयोग बन रहा है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार यह योग विशेष रूप से वृषभ, कर्क, तुला और मीन राशि के जातकों के लिए शुभ फलदायी माना जा रहा है। इससे करियर, व्यापार और आर्थिक मामलों में सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना जताई जा रही है।

पौराणिक महत्व: जब महाबली भीम भी डगमगा गए थे

इस व्रत के पीछे एक बेहद दिलचस्प पौराणिक कथा जुड़ी है। महाभारत काल में पांडवों में दूसरे भाई भीमसेन भोजन के अत्यधिक शौकीन थे और अपनी तीव्र भूख पर नियंत्रण नहीं रख पाते थे। जहां माता कुंती, द्रौपदी और बाकी चारों भाई हर एकादशी पर पूर्ण श्रद्धा से व्रत रखते थे, वहीं भीम अपनी इस लाचारी से बेहद परेशान थे। उन्हें लगता था कि व्रत न रखकर वह भगवान विष्णु का अनादर कर रहे हैं।

इस आत्मग्लानि से मुक्ति पाने के लिए भीम महर्षि वेदव्यास की शरण में पहुंचे। तब व्यास जी ने उन्हें ढाढस बंधाते हुए कहा कि यदि वह पूरे साल की चौबीस एकादशियों का व्रत नहीं कर सकते, तो उन्हें केवल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की 'निर्जला एकादशी' का उपवास करना चाहिए। व्यास जी ने स्पष्ट किया कि इस एक कठिन व्रत को पूरी निष्ठा से करने पर साल की सभी एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी कारण इसे 'भीमसेनी एकादशी' या 'पांडव एकादशी' भी कहा जाता है।

इन 4 राशियों के करियर और बिजनेस में मिल सकती है सफलता

ज्योतिषाचार्य पंडित राजेंद्र मुंजाल के अनुसार, इस पावन तिथि पर बन रहा लक्ष्मी नारायण राजयोग 4 राशियों के लिए वरदान साबित हो सकता है:

वृषभ राशि (Taurus):

करियर को लेकर किए जा रहे प्रयास इस समय रंग लाएंगे। लंबे समय से अटके हुए सरकारी या निजी काम पूरे होंगे। जो लोग नया स्टार्टअप या नई दुकान शुरू करने की सोच रहे हैं, उनके लिए यह समय बेहद अनुकूल है। नौकरीपेशा लोगों को प्रमोशन या बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है, जिससे आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।

कर्क राशि (Cancer):

यह राजयोग कर्क राशि के जातकों के लिए सबसे अधिक प्रभावशाली रहेगा, क्योंकि इसका निर्माण इसी राशि में हो रहा है। इसके प्रभाव से कार्यस्थल पर आपकी मेहनत की सराहना होगी और आय में जबरदस्त वृद्धि देखने को मिलेगी। समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा और कोई शुभ समाचार मन को प्रसन्न कर देगा।

तुला राशि (Libra):

तुला राशि के जातकों के जीवन से लंबे समय से चली आ रही परेशानियां अब दूर होंगी। आत्मविश्वास में अभूतपूर्व बढ़ोतरी होगी। व्यापार में नई योजनाएं मुनाफा देंगी। पारिवारिक रिश्तों में मिठास आएगी और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलने के साथ-साथ पुरानी बीमारियों से भी राहत मिलेगी।

मीन राशि (Pisces):

मीन राशि वालों के रुके हुए कामों में अब गति आएगी। धन आगमन के नए स्रोत बनेंगे, जिससे आर्थिक तंगी दूर होगी। भविष्य की योजनाओं में सकारात्मक प्रगति देखने को मिलेगी। परिवार का माहौल शांतिपूर्ण और सहयोगात्मक रहेगा।

दान का महात्म्य और व्रत पारण के कड़े नियम

विशेष ज्योतिषीय सलाह और दान का महत्व: इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की संयुक्त पूजा का विधान है। ज्येष्ठ की तपन से समाज को राहत देने के लिए इस दिन मिट्टी के घड़े (मटका), खरबूजा, आम, पंखा, वस्त्र और विशेष रूप से जल का दान करना अक्षय पुण्य देता है। इस दिन राहगीरों के लिए प्याऊ लगवाना सबसे बड़ा पुण्य कर्म माना गया है।

पारण की घड़ी: भूलकर भी न करें ये गलती

एकादशी व्रत का पूरा फल तभी मिलता है जब उसका पारण (व्रत खोलना) शास्त्रोक्त नियमों के अनुसार किया जाए।

हरि वासर का रखें ध्यान: द्वादशी तिथि के पहले एक-चौथाई हिस्से को हरि वासर कहा जाता है। इस अवधि में व्रत कभी नहीं खोलना चाहिए। श्रद्धालुओं को हरि वासर समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

समय का महत्व: व्रत खोलने का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल (सूर्योदय के बाद) होता है। यदि किन्हीं कारणों से सुबह पारण न हो पाए, तो मध्याह्न (दुपहर) के बाद करना चाहिए, लेकिन दोपहर के ठीक बीच में पारण करने से बचना चाहिए।

द्वादशी के भीतर पारण अनिवार्य: द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले व्रत खोलना अति आवश्यक है। शास्त्रों के अनुसार, द्वादशी बीत जाने के बाद व्रत खोलना पाप के समान माना जाता है।

नोट: इस वर्ष कुछ स्थानों पर स्मार्त (पारिवारिक जनों) और वैष्णव (संन्यासियों) के लिए व्रत की तिथियों में मामूली अंतर हो सकता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान विष्णु की विशेष कृपा के इच्छुक परम भक्त दोनों दिन भी व्रत रख सकते हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।