बालोद

छत्तीसगढ़ के छोटे से गांव से कर्नाटक तक पहुंची साहित्य की खुशबू, पिता-पुत्र ने रचा इतिहास, जानें कैसे

Chhattisgarhi Literature: बालोद के छोटे से गांव टिकरी से शुरू हुई पिता-पुत्र की यह साहित्यिक यात्रा अब कर्नाटक तक पहुंच गई है, जहां उनके बेटे और वरिष्ठ साहित्यकार अरुण कुमार निगम की कविताएं विश्वविद्यालय के हिंदी पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही हैं।
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Sep 14, 2026
Chhattisgarh News
पिता-पुत्र ने रचा इतिहास (फोटो सोर्स- AI, पत्रिका)

बालोद@सतीश रजक। Hindi Diwas 2026: बालोद जिले के छोटे से गांव टिकरी (अर्जुंदा) की दो पीढ़ियों ने हिंदी और छत्तीसगढ़ी साहित्य में अपनी एक खास पहचान बनाई है। एक ओर जहां पिता जनकवि कोदूराम 'दलित' ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनी रचनाओं से गांव-गांव में आजादी की अलख जगाई, वहीं उनके पुत्र वरिष्ठ साहित्यकार अरुण कुमार निगम की कविताएं आज कर्नाटक के अहिंदी भाषी छात्र पढ़ रहे हैं।

हिंदी दिवस के अवसर पर पिता-पुत्र की यह साहित्यिक विरासत पूरे अंचल को गौरवान्वित कर रही है। जनकवि कोदूराम 'दलित' (1924-2002) की रचनाओं में किसान, मजदूर, शोषित और वंचित वर्ग की आवाज प्रमुखता से मुखरित हुई। स्वतंत्रता आंदोलन के समय उनके लिखे ओजपूर्ण गीतों ने लोगों में देशभक्ति का संचार किया। उनकी छत्तीसगढ़ी रचनाओं को स्कूली पाठ्यपुस्तकों में भी शामिल किया गया है।

कर्नाटक के पाठ्यक्रम में अरुण निगम की कविताएं

पिता की इस समृद्ध विरासत को उनके पुत्र अरुण कुमार निगम आगे बढ़ा रहे हैं। भारतीय स्टेट बैंक के मुख्य प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त निगम पिछले 53 वर्षों से हिंदी और छत्तीसगढ़ी में निरंतर लेखन और छंद साधना कर रहे हैं। उनकी कविताएं कर्नाटक के विजयपुर स्थित 'अक्का महादेवी महिला विश्वविद्यालय' के स्नातक स्तर के अनिवार्य हिंदी पाठ्यक्रम में पिछले पांच वर्षों से पढ़ाई जा रही हैं। इसके अलावा, उन्होंने अपने पिता की छह अप्रकाशित पुस्तकों का संपादन कर उन्हें प्रकाशित भी कराया है।

300 से अधिक कवियों की पाठशाला

छंद विधान और छत्तीसगढ़ी व्याकरण को बढ़ावा देने के लिए अरुण निगम पिछले एक दशक से 'छंद के छ-ऑनलाइन गुरुकुल' चला रहे हैं। इसके माध्यम से वे प्रदेश के 300 से अधिक नवोदित कवियों को नि:शुल्क छंद की बारीकियां सिखा चुके हैं। उनके मार्गदर्शन में सीखे कवियों की 45 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

'हिंदी को व्यवहार में अपनाना ही सच्चा सम्मान'

साहित्यकार अरुण निगम का मानना है कि हिंदी और छत्तीसगढ़ी दोनों बहनों की तरह हैं। भाषा केवल जीविका चलाने का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार जगाने का जरिया है। हिंदी को अपने दैनिक व्यवहार में पूरी निष्ठा के साथ अपनाना ही उसके प्रति सच्चा सम्मान है। टिकरी गांव से शुरू हुई यह साहित्यिक यात्रा आज दक्षिण भारत तक हिंदी की महक फैला रही है।

जनकवि 'दलित' की अमर कृतियां और सम्मान

छत्तीसगढ़ी साहित्य के पुरोधा जनकवि कोदूराम 'दलित' केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ही नहीं, बल्कि अंचल की माटी की खुशबू को कागज़ पर उकेरने वाले अनूठे शिल्पी थे। 'सियानी गोठ', 'बहुजन हिताय', 'दू मितान' और 'कनवा समधी' जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने लोक जीवन के दुख-दर्द और सहज हास्य को जन-जन तक पहुँचाया। उनकी बहुचर्चित रचनाएं आज भी ग्रामीण संस्कृति और सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल मानी जाती हैं। तत्कालीन साहित्य मंडलियों और राज्य शासन द्वारा उन्हें उनकी उत्कृष्ट लोक-साहित्य सेवा के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।

Updated on:
14 Sept 2026 03:51 pm
Published on:
14 Sept 2026 01:00 pm