
बालोद@सतीश रजक। Hindi Diwas 2026: बालोद जिले के छोटे से गांव टिकरी (अर्जुंदा) की दो पीढ़ियों ने हिंदी और छत्तीसगढ़ी साहित्य में अपनी एक खास पहचान बनाई है। एक ओर जहां पिता जनकवि कोदूराम 'दलित' ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनी रचनाओं से गांव-गांव में आजादी की अलख जगाई, वहीं उनके पुत्र वरिष्ठ साहित्यकार अरुण कुमार निगम की कविताएं आज कर्नाटक के अहिंदी भाषी छात्र पढ़ रहे हैं।
हिंदी दिवस के अवसर पर पिता-पुत्र की यह साहित्यिक विरासत पूरे अंचल को गौरवान्वित कर रही है। जनकवि कोदूराम 'दलित' (1924-2002) की रचनाओं में किसान, मजदूर, शोषित और वंचित वर्ग की आवाज प्रमुखता से मुखरित हुई। स्वतंत्रता आंदोलन के समय उनके लिखे ओजपूर्ण गीतों ने लोगों में देशभक्ति का संचार किया। उनकी छत्तीसगढ़ी रचनाओं को स्कूली पाठ्यपुस्तकों में भी शामिल किया गया है।
पिता की इस समृद्ध विरासत को उनके पुत्र अरुण कुमार निगम आगे बढ़ा रहे हैं। भारतीय स्टेट बैंक के मुख्य प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त निगम पिछले 53 वर्षों से हिंदी और छत्तीसगढ़ी में निरंतर लेखन और छंद साधना कर रहे हैं। उनकी कविताएं कर्नाटक के विजयपुर स्थित 'अक्का महादेवी महिला विश्वविद्यालय' के स्नातक स्तर के अनिवार्य हिंदी पाठ्यक्रम में पिछले पांच वर्षों से पढ़ाई जा रही हैं। इसके अलावा, उन्होंने अपने पिता की छह अप्रकाशित पुस्तकों का संपादन कर उन्हें प्रकाशित भी कराया है।
छंद विधान और छत्तीसगढ़ी व्याकरण को बढ़ावा देने के लिए अरुण निगम पिछले एक दशक से 'छंद के छ-ऑनलाइन गुरुकुल' चला रहे हैं। इसके माध्यम से वे प्रदेश के 300 से अधिक नवोदित कवियों को नि:शुल्क छंद की बारीकियां सिखा चुके हैं। उनके मार्गदर्शन में सीखे कवियों की 45 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
साहित्यकार अरुण निगम का मानना है कि हिंदी और छत्तीसगढ़ी दोनों बहनों की तरह हैं। भाषा केवल जीविका चलाने का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार जगाने का जरिया है। हिंदी को अपने दैनिक व्यवहार में पूरी निष्ठा के साथ अपनाना ही उसके प्रति सच्चा सम्मान है। टिकरी गांव से शुरू हुई यह साहित्यिक यात्रा आज दक्षिण भारत तक हिंदी की महक फैला रही है।
छत्तीसगढ़ी साहित्य के पुरोधा जनकवि कोदूराम 'दलित' केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ही नहीं, बल्कि अंचल की माटी की खुशबू को कागज़ पर उकेरने वाले अनूठे शिल्पी थे। 'सियानी गोठ', 'बहुजन हिताय', 'दू मितान' और 'कनवा समधी' जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने लोक जीवन के दुख-दर्द और सहज हास्य को जन-जन तक पहुँचाया। उनकी बहुचर्चित रचनाएं आज भी ग्रामीण संस्कृति और सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल मानी जाती हैं। तत्कालीन साहित्य मंडलियों और राज्य शासन द्वारा उन्हें उनकी उत्कृष्ट लोक-साहित्य सेवा के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।