अपने दो बेटों को पिता का नाम दिलाने के लिए 9 साल से संघर्ष कर रही महिला को इंसाफ मिल गया।
बालोद. अपने दो बेटों को पिता का नाम दिलाने के लिए 9 साल से संघर्ष कर रही महिला को इंसाफ मिल गया। उसके दो बेटों का डीएनए उनके पिता के डीएनए से मिल गया। इन बेटों को पिता ने अपना मानने से इनकार कर दिया था। न्याय के लिए महिला को बालोद से लेकर हाईकोर्ट बिलासपुर तक कानूनी लड़ाई लडऩी पड़ी।
महिला ने बिलासपुर हाईकोर्ट में अपील की थी कि वह बच्चों के पिता से अपने बेटों का डीएन टेस्ट कराना चाहती है। कोर्ट ने उनकी अपील की स्वीकार कर डीएनए टेस्ट कराने के लिए आदेश दिया। इसके बाद दो बेटों, महिला व पिता के डीएनए टेस्ट के लिए ब्लड सैंपल बैंगलुरू भेजा गया था। जिसकी जांच रिपोर्ट 8 मार्च को आई।
महिला के पक्ष में रिपोर्ट आई। पिता और बेटों का डीएनए मिल गया। युवक ईश्वर साहू ने अपनी पहली पत्नी से तलाक होने की बात कह कर रामेश्वरी साहू के परिवार के सामने उससे शादी का प्रस्ताव रखा। इसके बाद दोनों परिवार, ग्रामीणों और समाज की सलाह पर ईश्वर साहू दुबचेरा ने चूड़ी प्रथा के तहत रामेश्वरी साहू को चूड़ी पहना कर अपनी पत्नी बना लिया और घर ले गया।
लगभग डेढ़ साल के बाद दोनों का एक पुत्र हुआ। इसके एक साल के बाद दूसरे बच्चे का जन्म हुआ। इस दौरान पता चला कि ईश्वर साहू की पहली पत्नी का तलाक नहीं हुआ है, उसका कोर्ट में केस चल रहा है। पहली पत्नी भरण पोषण का केस जीत गई। इसके बाद ईश्वर ने चूड़ी पहना कर लाई महिला रामेश्वरी को उसके मायके में छोड़ दिया।
उससे कहा कि वह कुछ दिनों के लिए मजदूरी करने बाहर जा रहा है, वहां से आने के बाद उसे ले जाएगा। लगभग सालभर के इंतजार के बाद वह नहीं आया तो रामेश्वरी ने समाज गुहार लगाई। इसके बाद कोर्ट चली गई। बावजूद ईश्वर दोनों बेटों को अपना मानने से इनकार करते रहा। अंतत: उसकी जीत हुई।
ईश्वर ने 29 मार्च 1998 को चूड़ी प्रथा के तहत रामेश्वरी साहू को अपनी पत्नी बना कर घर ले गया था। दो साल के बाद 2000 से 2009 तक मामला समाज में चला। 2009 में वह कोर्ट में चली गई। अब 9 साल के बाद फैसला आया है।
जीत की खुशी में रो पड़ी महिला
रामेश्वरी के वकील फत्तेचंद जैन ने बताया कि कोर्ट का फैसला इस महिला के लिए ऐतिहासिक है। महिला का विश्वास नहीं डिगा और आखिर में डीएनए टेस्ट में साबित हो गया कि रामेश्वरी के दोनों बच्चे ईश्वरी के ही हैं। रामेश्वरी ने बताया कि उसे विश्वास था कि वह जीतेगी। जीत हमेशा सच्चाई की होती है और जीत सत्य की हुई भी।