राजनीति: विस्तार टालते रहना सहज विकल्प, निकाय चुनाव के बाद रिक्त पद भरने पर विचार निगम-मंडलों में विधायकों की नियुक्तियों में भी देर
बेंगलूरु. जद-एस और कांग्रेस गठबंधन सरकार के मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिलने से बगावत पर उतारू दोनों दलों के कई वरिष्ठ नेता भले ही अभी खामोश हैं, मगर कभी भी एक चिंगारी उनके असंतोष की आग को भड़का सकती है। मंत्रिमंडल में खाली मंत्रियों का पद भरने की कवायद ऐसी ही एक चिंगारी है जिसे कोई भी गठबंधन दल हवा देने से बच रहा है।
पहले तो आषाढ़ माह (कन्नड़ पंचाग के अनुसार) के कारण मंत्रिमंडल विस्तार टला और अब नगर निकाय चुनाव करीब हैं। निगर निकाय चुनावों के समय कोई भी पार्टी वरिष्ठ नेताओं की नराजगी मोल नहीं लेना चाहती। ऐसे में पहले 15 अगस्त तक टाला गया मंत्री विस्तार अब चुनावों के मद्देनजर कुछ और दिनों तक नहीं होगा। संभवत: अब यह मंत्रिमंडल विस्तार आगामी लोकसभा चुनानों तक नहीं हो।
दरअसल, गठबंधन सरकार के अस्तित्व में आने के बाद दोनों दलों के बीच मंत्रिमंडल गठन का फार्मूला तय करने में काफी उठापठक हुई। जो फार्मूला तय हुआ उसमें कांग्रेस को 22 और जद-एस को 12 मंत्री पद देने पर सहमति बनी। राज्य विधानसभा की कुल 224 सीटों के हिसाब से यहां मंत्री परिषद की अधिकतम संख्या 34 हो सकती है। मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी के साथ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. जी परमेश्वर ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ 23 मई को ली थी। उसके बाद 6 जून को पहला मंत्रिमंडल विस्तार हुआ, जिसमें कांग्रेस के 14 और जद एस के 9 मंत्रियों ने शपथ ली जबकि कांग्रेस कोटे से केपीजेपी व जद-एस कोटे से बसपा के 1-1 मंत्री बने।
इस तरह अब तक मंत्री परिषद में कांग्रेस के कुल 16 (उपमुख्यमंत्री सहित) और जद एस के 11 (मुख्यमंत्री सहित) सदस्य हैं। यानी, कुल 27 पद भरे जा चुके हैं और शेष 7 पदों को भरने के लिए मंत्रिमंडल विस्तार किया जाना है। इनमें से छह कांग्रेस के कोटे की हैं जबकि एक जद-एस के खाते की।
दरअसल, मंत्रिमंडल विस्तार कांग्रेस और जद-एस दोनों दलों के लिए अग्निपरीक्षा जैसा है। किसी तरह ठंडे पड़े असंतोष की आग को कोई भी फिर से भड़काना नहीं चाहता है। मंत्री पद की सीमित संख्या और बड़ी मांग के साथ दबाव की राजनीति को अगर सही तरीके से निपटाया गया तो गंभीर परिस्थितियां खड़ी हो जाएंगी।
खासतौर पर पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या के समर्थकों को अगर वर्तमान गठबंधन सरकार उचित स्थान नहीं मिलता है तो फिर स्थिति को संभालना मुश्किल हो जाएगा। हालांकि, कथित तौर पर कांग्रेस आलाकमान ने अपने हिसाब से सिद्धरामय्या को समझाया है और उन्हें गठबंधन सरकार के सुचारु संचालन में सहयोग देने को कहा है। गठबंधन सरकार में संयोजक समिति के प्रमुख सिद्धरामय्या फिलहाल राहुल गांधी के निर्देशों पर चुप हैं। हालांकि, दोनों दल विभिन्न निगमों और मंडलों के अध्यक्ष का पद देकर असंतुष्टों को मनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कई ऐसे वरिष्ठ नेता हैं जो पिछली सरकारों में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं।
कांग्रेस के कई असंतुष्ट वरिष्ठ नेता पार्टी नेतृत्व के सामने आंकड़ों का हवाला देकर अपनी बात रख रहे हैं। जोरदार लाबिंग के साथ-साथ वे कई कारण गिना रहे हैं। हालांकि, कांग्रेस ने कुछ वरिष्ठ नेताओं को चुप करा दिया है लेकिन उत्तर कर्नाटक के कई ऐसे असंतुष्ट नेता हैं राज्य के इस हिस्से के साथ हुए अन्याय की बातें कर रहे हैं। उनका कहना है कि उत्तर कर्नाटक से मंत्रिमंडल में कांग्रेस को अपना प्रतिधित्व बढ़ाना होगा। इन मुश्किल हालातों से निपटने के लिए कांग्रेस और जद एस दोनों के लिए सहज विकल्प यही है कि वे मंत्रिमंडल विस्तार को टालते रहें। बोर्ड और निगमों का अध्यक्ष का पद देकर कुछ नेताओं को संतुष्ट करें वहीं वरिष्ठ नेताओं से गठबंधन सरकार चलाने में सहयोग मांगकर आगे बढ़ते रहें। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मंत्रिमंडल विस्तार पर विचार अब लोकसभा चुनावों के बाद ही होगा।
डेढ़ महीने से नहीं हुई समन्वय समिति की बैठक
गठन की समन्वय समिति की बैठक भी पिछले डेढ़ महीने से नहीं हुई है। समिति की पिछली बैठक भी 5 जुलाई को पेश हुए संशोधित बजट से पहले हुई थी जिसमें कुमारस्वामी सरकार के बजट प्रस्तावों पर चर्चा हुई थी। इसके बाद से समिति की बैठक नहीं हुई है। सरकार गठन के समय दोनों दलों ने सरकार के सुचारु संचालन और समन्वय के लिए 15 दिनों के अंतराल पर समिति की बैठक होने की बात कही थी लेकिन जानकारों का कहना है कि बजट पर कुमारस्वामी और सिद्धरामय्या के बीच मतभेद के बाद से दोनों दलों के नेता समिति की बैठक को लेकर ज्यादा उत्सुक नहीं है।
सिद्धरामय्या ने शहरी निकाय चुनाव की घोषणा के बाद कहा था कि अगर चुनाव आयोग विस्तार की अनुमति देेगा तो नए मंत्रियों को शपथ दिलाई जाएगी। सिद्धरामय्या ने यह बात पिछले पखवाड़े कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात के बाद कही थी। इसके बाद राहुल प्रदेश के दौरे पर भी आ चुके हैं। दोनों दलों के नेताओं का कहना है कि फिलहाल निकाय चुनाव के कारण विस्तार टला है और अगले महीने के मध्य में नए मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है।