
बेंगलूरु। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के साथ ही पार्टी के भीतर की रार खुलकर सामने आ गई है। मंत्री पद की उम्मीद लगाए बैठे विधायकों की अनदेखी से नाराज दो विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है, वहीं कई वरिष्ठ नेताओं ने आलाकमान के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया है।
मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान मंत्रियों की सूची दो बार जारी की गई। पहली सूची में भटकल के विधायक मनकल वैद्य को जगह दी गई थी, लेकिन आखिरी मिनट में उनका नाम बदल दिया गया और उनकी जगह दावणगेरे के विधायक एस.एस. मल्लिकार्जुन का नाम जोड़ा गया। जबकि एमएलसी गायत्री शांतेगौड़ा का नाम काटकर एक पद खाली छोड़ दिया गया। हालांकि गायत्री की अनदेखी पर पार्टी ने कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि दिग्गजों के दबाव के चलते यह फैसला लिया गया।
सबसे बड़ा झटका तीन बार के इंडी विधायक यशवंतरायगौड़ा पाटिल से लगा, जिन्होंने डिप्टी स्पीकर को अपना इस्तीफा सौंप दिया। उन्होंने कहा कि वे कांग्रेस परिवार से अपने रिश्ते खत्म कर रहे हैं। गौरतलब है कि इंडी राज्य की एकमात्र ऐसी सीट है, जहां से आज तक कोई मंत्री नहीं बन पाया है।
सागर से विधायक बेलूर गोपालकृष्ण ने भी इस्तीफे का ऐलान करते हुए तीखा सवाल दागा। उन्होंने पूछा कि क्या मंत्री पद केवल पूर्व मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के बच्चों के लिए आरक्षित हैं? अगर सत्ता सुख भोग चुके लोगों को ही बार-बार मौका मिलेगा, तो मुझ जैसे विधायकों का क्या भविष्य है? उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें मंत्री बनाने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन रातभर में सूची बदल दी गई। भद्रावती के विधायक संगमेश ने भी अपनी उपेक्षा पर नाराजगी जाहिर करते हुए इस्तीफे की धमकी दी है। पूर्व मंत्री व प्रदेश अध्यक्ष दिनेश गुंडूराव ने भी सोशल मीडिया पोस्ट में काफी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उधर, विजयनगर और गोविंदराजनगर के विधायक एम. कृष्णप्पा और प्रियाकृष्णा के समर्थकों ने बसों की आवाजाही रोककर नारेबाजी की।
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं से धैर्य रखने की अपील करते हुए कहा कि पार्टी में कई योग्य विधायक हैं, लेकिन हर किसी को एक साथ मंत्री बनाना संभव नहीं है। कई विधायक मंत्री बनने के योग्य हैं। वह इससे इनकार नहीं करते, लेकिन कुछ परिस्थितियों में पार्टी को फैसला लेना पड़ता है। उन्हें भी 2004 में मंत्री नहीं बनाया गया था। सिद्धारमैया सरकार (2013-18) में भी शुरुआत में उन्हें कैबिनेट में जगह नहीं मिली थी। उन्होंने धैर्य रखा है आज उसी का परिणाम है कि वह मुख्यमंत्री पद पर है।