पिछले 35–40 वर्षों से मलनाड क्षेत्र को प्रभावित कर रही यह बीमारी हर साल हजारों लोगों को संक्रमित करती है और सैकड़ों लोगों की जान ले चुकी है। इसके बावजूद अब तक इसका कोई निश्चित उपचार उपलब्ध नहीं है। जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों का आरोप है कि सरकार ने बीमारी के प्रभावी नियंत्रण के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं।
क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज Kyasanur Forest Disease (केएफडी), जिसे आमतौर पर मंकी फीवर Monkey Fever कहा जाता है, इस वर्ष अपेक्षा से पहले ही सामने आ गया है, जिससे कर्नाटक Karnataka के मलनाड Malnad क्षेत्र में चिंता बढ़ गई है। दिसंबर महीने में ही चिक्कमगलूरु और शिवमोग्गा जिलों से 12 मामले दर्ज किए गए थे। उत्तर कन्नड़ जिले से दो नए मामलों के सामने आने के बाद कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 14 हो गई है।
अधिकारियों के अनुसार, उत्तर कन्नड़ जिले के होनावर तालुक के सालकोड गांव के एक युवक में मंकी फीवर की पुष्टि हुई है, जिसे तालुक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। वहीं, सिद्धापुर तालुक के हेरूर गांव की 80 वर्षीय महिला को सिरसी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुंडूराव ने दो वर्ष पहले मंकी फीवर की वैक्सीन जल्द उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया था, लेकिन अब तक वैक्सीन तैयार नहीं हो सकी है। अधिकारियों का कहना है कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) नए वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल कर रहा है। वैक्सीन को तैयार होने में कम-से-कम दो और वर्ष लग सकते हैं। क्षेत्र के निवासियों ने सरकार से बीमारी पर काबू पाने के लिए प्रभावी वैक्सीन और विशेष दवा शीघ्र उपलब्ध कराने की मांग की है।
पिछले 35–40 वर्षों से मलनाड क्षेत्र को प्रभावित कर रही यह बीमारी हर साल हजारों लोगों को संक्रमित करती है और सैकड़ों लोगों की जान ले चुकी है। इसके बावजूद अब तक इसका कोई निश्चित उपचार उपलब्ध नहीं है। जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों का आरोप है कि सरकार ने बीमारी के प्रभावी नियंत्रण के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मानसून के अंत तक, यानी अगले लगभग पांच महीनों तक, मलनाड क्षेत्र में इस बीमारी के बने रहने की संभावना है। टिक्स की असामान्य बढ़ोतरी जून के आसपास तक वायरस के फैलने की गति को बढ़ा सकती है। इसके विपरीत, उत्तर कन्नड़ जिले में टिक्स लार्वा अवस्था में हैं। एहतियाती उपायों के तहत स्वास्थ्य विभाग ने हाथों और शरीर पर लगाने के लिए औषधीय तेल वितरित किया है और घर-घर जागरूकता अभियान तेज किया है। हालांकि, क्षेत्र की लगभग 90 प्रतिशत आबादी वन क्षेत्रों में रहती है, जिससे संक्रमण का खतरा लगातार बना हुआ है।
जिला केएफडी चिकित्सा अधिकारी डॉ. सतीश शेट्टी ने लोगों से सावधानी बरतने और सरकारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करना चाहिए।
डॉ. शेट्टी ने बताया कि अब तक शिवमोग्गा में ही केएफडी जांच की एकमात्र प्रयोगशाला थी। इस वर्ष सिरसी में नई प्रयोगशाला को मंजूरी दी गई है, जो शीघ्र ही कार्य शुरू करेगी। स्वास्थ्य विभाग ने तालुक और जिला अस्पतालों में केएफडी मरीजों के लिए नि:शुल्क उपचार की व्यवस्था की है, जबकि गंभीर मरीजों का इलाज मणिपाल स्थित कस्तूरबा अस्पताल में किया जा रहा है।