
बेंगलूरु. जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में जय परिसर में आयोजित धर्मसभा में जयधुरंधर मुनि ने कहा कि परिवार में टकराव नहीं समझौता करना सीखें। कलह नहीं, सुलह करें। रिश्तों को निभाने की कला जानना जरूरी है।
आप सही हैं तो उस समय चुप रहें और गलत हैं तो स्वीकार करने में हिचकिचाहट न हो। परिवार को एक वृक्ष की उपमा दी जाती है, जिसकी जड़ होती है वह अनुभवी पीढ़ी बुजुर्गों की और फल, फूल और पत्तियों के रूप में होती है।
जहां बाल्यकाल रूपी बाल पीढ़ी और तना एवं शाखा हैं। जहां ये एकजुट हों तो कोई उखाड़ नहीं सकता है। मुनि ने कहा कि अभिभावक बाल्यकाल में ही बच्चों को संस्कार दें। बच्चों के चरित्र निर्माण एवं जीवन शैली में भी माता-पिता की भूमिका है।
बच्चों को सच बोलना सिखाना चाहिए। अपने बच्चों को सकारात्मक सोच के धनी बनाएं। पढ़ाई उनके ऊपर बोझ रूप न होकर ज्ञानवर्धक है, ऐसा बोध उन्हें कराएं।
बच्चों की संगत कैसी हो, यह सुनिश्चित करने का काम अभिभावकों का होता है। इससे पूर्व संस्कार शिविर का समापन हुआ। बालक-बालिकाओं ने शिविर के अपने अनुभव साझा किए।