किसान परेशान: मुनाफा दूर, लगात भी नहीं निकल रहा
योगेश शर्मा
बेंगलूरु. सरकारों की नीतियों के चलते राज्य में आधे से अधिक दाल मिलें बंद हो चुकी हैं। प्रमुख खरीद एजेन्सी नैफेड द्वारा समर्थन मूल्य से भी कम पर दालों का कारोबार किए जाने से सरकारी प्रयासों का पलीता लगता दिख रहा है। इससे जहां किसान अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है। वहीं व्यापारी हाथ पर हाथ धरे बैठा है। किसानों का कहना है कि केन्द्र सरकार ने डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन किसान आयोग की सिफारिशों को भी तोड़मरोड़ कर पेश किया, इसके चलते किसानों को लाभ होने के बजाय नुकसान उठाना पड़ रहा है।
बेंगलूरु थोक खाद्यान्न व दाल विक्रेता संघ के अध्यक्ष रमेशचन्द्र लाहोटी ने बताया कि कर्नाटक-महाराष्ट्र में समर्थन मूल्य के लिए का कानून बन चुका है। लेकिन अभी लागू नहीं हुआ है। यदि कानून लागू होता है तो सरकार की प्रमुख एजेन्सी नैफेड के खिलाफ ही आपराधिक मामला बनता है क्योंकि नैफेड समर्थन मूल्य से कम पर दालों की बिक्री कर रही है।
उन्होंने बताया कि केन्द्र सरकार ने जहां तूअर दाल का समर्थन मूल्य 55 रुपए प्रति किलो निर्धारित किया है। वहीं नैफेड 33 रुपए प्रति किलो में तूअर दाल की ब्रिकी कर रही है। राज्य में समर्थन मूल्य पर दहलन की खरीद व बिक्र नहीं हो रही है। इससे किसान और व्यापारी प्रभावित हो रहे हैं। सरकार की ओर से विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आमजन को सीधे तौर पर 17 रुपए प्रति किलो तूअर दाल उपलब्ध कराई जा रही है।
लाहोटी का कहना है दलहन बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के भी प्रवेश करने से किसानों और व्यापारियों को सीधे तौर पर नुकसान हो रहा है। राज्य के किसान और व्यापारी जल्द ही इसको लेकर बड़ा आन्दोलन शुरू कर सकते हैं। इसको लेकर सुगबुगाहट चल रही है। लाहोटी ने कहा कि राजस्थान में विधानसभा चुनाव का फायदा लेने के लिए सरकार ने मूंग के समर्थन मूल्य में 3 हजार रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की है। जबकि दलहन उत्पादन में देश में दूसरे नम्बर के राज्य कर्नाटक की अनदेखी की गई है।
प्रदेश की आधी दाल मिलें बंद
दालों के समर्थन मूल्य से भी कम पर बेचे जाने से व्यापारी पूरी तरह टूट चुका है। इसके चलते कर्नाटक में आधी से अधिक दाल मिलें बंद हो चुकी हैं। जो चल रही हैं वे भी अंतिम सांसें गिन रही हैं। कलबुर्गी के दाल मिल व्यापारी दामोदार गिल्डा की मानें तो अकेले कलबुर्र्गी में 300 दाल मिलें थीं। वर्तमान में केवल 100 दाल मिलें चल रही हैं। दो सौ दाल मिलों के ताले लग चुके हैं। उनके मुताबिक इसके लिए केन्द्र सरकार की 'समर्थन मूल्य नीतिÓ जिम्मेदार है। केन्द्र सरकार आए दिन नया प्रावधान बनाकर किसानों और व्यापारियों को छल रही है। पहले जहां पांच साल में एक बार समर्थन मूल्य निर्धारित किया जाता था। वहीं अब साल में चार बार समर्थन मूल्य तय किए जाने से कमोडिटी व्यापार तो पूरी तरह चौपट हो चुका है, वहीं दालों का व्यापार करने वाले व्यापारी व उत्पादक किसान भी सुरक्षित नहीं रहे हैं।
तूअर दाल के दाम बढऩे की संभावना नहीं
गिल्डा ने बताया कि वर्तमान में देश में तूअर का भारी मात्रा में स्टॉक है। नई फसल भी आने को है। ऐसे में तूअर के दाम बढऩे की उम्मीद करना बेमानी है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 में दालों का बाजार चढ़ा था। इसके बाद से दलहन बाजार में नरमी का रुख है। अब तो हाल ये है कि भाव धरातल पर आ चुके हैं। गिल्डा ने बताया कि बीदर में 16 दाल मिल थीं, अब 8 ही चालू हैं। शाहबाद में 18 में से 8 ही दाल मिलें चालू हैं। उन्होंने महाराष्ट्र की शुगर मिलों की तर्ज पर कनार्टक के दाल मिलों के व्यापारियों को भी इन्सेन्टिव देने की मांग की है। व्यापारियों का कहना है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां लोगों को मूर्ख बनाकर 1 रुपए प्रति किलो में दाल उपलब्ध कराने का दावा कर रही हैं जबकि सच्चाई इससे परे है। उपभोक्ता को एक किलो दाल के लिए मोटी राशि डिलीवरी शुल्क के रूप में चुकानी पड़ती है। इससे दाल की कीमत बाजार भाव से भी ऊंची हो जाती है।
क्या कहते हैं किसान नेता
कलबुर्गी के किसान नेता मारुति मानपड़े का कहना है कि केन्द्र सरकार की कथनी और करनी में साफ अंतर है। एक तरह डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन किसान आयोग किसानों का हित साधने के लिए लागत मूल्य पर पचास फीसदी लाभ देकर समर्थन मूल्य तय करने की बात करता है। वहीं सरकार वास्तविक कीमत के पचास फीसदी पर समर्थन मूल्य देने की बात कर रही है। ये किसानों के साथ धोखाधड़ी है। दलहन उत्पादन की लागत प्रतिदिन बढ़ रही है, वहीं समर्थन मूल्य से भी कम पर किसानों की फसलें बिकने से किसान बर्बाद हो रहा है।