मुनि नेे कहा कि श्रावक का पहला गुण अक्षुद्रता है
बेंगलूरु. जयपरिसर महावीर धर्मशाला में जयधुरन्धर मुनि ने कहा कि धर्म बाह्य दिखावे या ढोंग विशेष से नहीं होना चाहिए, अपितु धर्म ढंग से, भीतर से प्रकट होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म का मर्म समझते हुए जो धर्म का आचरण करता है वही सच्चा धार्मिक कहलाता है। सिर्फ शुद्ध हृदय में ही धर्म टिकता है। जिस प्रकार सिंहनी का दूध स्वर्ण पात्र में ही सुशोभित होता है उसी प्रकार श्रावक भी अपने 21 गुणों ही श्रेष्ठता को प्राप्त करते हैं। मुनि नेे कहा कि श्रावक का पहला गुण अक्षुद्रता है। श्रावक अपने उच्च जाति के अनुरूप ही उच्च कार्यों में से संलग्न रहता है। श्रावक की पहचान न जाति से है न ख्याति से है, न वेश है न देश है बल्कि उसके सम्यक व्यवहार से है। इस अवसर पर संदीप छाजेड़ ने सात उपवास, कविता गोटावत ने पांच उपवास की तपस्या के प्रत्ख्यान ग्रहण किए। संचालन रविंद्र चोरडिय़ा ने किया।
वाणी को तोल कर बोलें
बेंगलूरु. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चामराजपेट में साध्वी अर्पिता ने मृषावाद के बारे में कहा कि हमारे बोलने की कला कैसी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें व्यापार आदि कार्य में झूठ बोलना पड़ता है। यदि हम झूठ बोलते हैं तो अपनी ही आत्मा का पतन करते हैं। इसलिए हमें जो भी बोलना है सोच समझ कर, अपनी वाणी को तोलकर बोलना चाहिए।
एक ही वचन से दो घरों में भी दरार आ जाती है। एक ही वचन से महाभारत शुरू हो गया, जिससे अनेक घरों की औरतें विधवा हो गईं। कई की गोद सूनी हो गई थी। इसलिए हमें जो बोलना है सोच समझ कर बोलना है। साध्वी के सांसारिक परिजन तातेड़ परिवार का संघ संचालक माणकचंद रुणवाल, संपतराज बाफणा व उम्मेदराज कांकरिया व महिला मंडल ने स्वागत किया। संचालन महावीरचंद गुलेच्छा ने किया।
धर्म की साधना में है जीवन की सफलता
मैसूरु. सुमतिनाथ जैन संघ के तत्वावधान में महावीर भवन में आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि मानव जीवन को पाकर जिसने धर्म पुरुषार्थ में उद्यम नहीं किया है, उसका जीवन निष्फल है। उन्होंने कहा कि मानव जीवन की सच्ची सफलता धर्म और मोक्ष पुरुषार्थ की साधना में ही है। मोक्ष साध्य पुरुषार्थ है और धर्म उसका साधन है। लोक में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थ कहे गए हैं। एक अगस्त से महामंगलकारी सिद्धि तप शुरू होगा।