मुनि रणजीत कुमार ने कहा कि अरिहंत दीक्षा के समय सिद्धों को नमस्कार करते हैं फिर वे साधना करते हैं
बेंगलूरु. यशवंतपुर स्थित तेरापंथ भवन में मुनि रणजीत कुमार एवं मुनि रमेश कुमार के सान्निध्य में नमस्कार महामंत्र साधना प्रयोग सप्ताह के अंतर्गत णमो सिद्धाणं पद की विवेचना एवं प्रयोग कराए गए। मुनि रणजीत कुमार ने कहा कि अरिहंत दीक्षा के समय सिद्धों को नमस्कार करते हैं फिर वे साधना करते हैं। अरिहंत कभी भी अरिहंत को नमस्कार नहीं करते।
सिद्ध अशरीरी होते हैं। वे सुख-दु:ख आदि का संवेदन नहीं करते। सिद्ध हमारे आदर्श हैं। उनके ध्यान और स्मरण से हमारे कर्मों की निर्जरा होती है।
मुनि रमेश कुमार ने कहा कि संसारी जीवों में सबसे उत्कृष्ट आत्मा परमात्मा कहलाती है। जो व्यवहार नय़ की दृष्टि से देहरूपी देवालय में बसता है।
परंतु निश्चय नय सी दृष्टि देह से भिन्न है। मुनि ने नमस्कार महामंत्र का रंगों के साथ प्रयोग कराया। नमो सिद्धाणं पद के कुछ मंत्रों सहित विशेष प्रयोग भी कराए।
दूसरों के घर पर पत्थर मारे तो खुद का ही नुकसान
चामराजनगर. गुंडलपेट में वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ के तत्वावधान में साध्वी साक्षी ज्योति ने कहा कि आदमी आज जीने की तमीज भूल गया है। शीशे के मकान में बैठकर दूसरों के घर पर पत्थर मारने से स्वयं का ही नुकसान करना है। उन्होंने कहा कि गैर पर तो उंगली उठाना आसान है, लेकिन खुद पहले अपने भीतर झांकना भी परम आवश्यक है।
स्वयं को झांकने, स्वयं को देखने की सीख देते हुए साध्वी ने कहा कि दूसरों में झांकना बंद करना चाहिए। हमें अपने आत्मा के घर को संभालने पर ही जीवन सफल और सार्थक होगा, क्योंकि जब-जब इंसान दूसरों का चिंतन करता रहता है, दूसरों की बुराइयां, कमियां देखता रहता है, दूसरों की कमियां देखते-देखते उसका जीवन कमियों से भर जाता है। इसलिए हमें दूसरों को देखने की बजाय स्वयं को देखना होगा, स्वयं को आंकना होगा और स्वयं में परिभ्रमण करना होगा। तभी हमारा जीवन सुखी, श्रेष्ठ और उज्जवल बन पाएगा।