
बेंगलूरु. वर्धमान स्थानकवासी श्रावक संघ सिद्धार्थनगर में स्थित सी.आई.टी.बी. परिसर में चातुर्मास के लिए विराजित श्रुत मुनि ने कहा कि अनुयोग सूत्र में सात स्वरों का उल्लेख आता है। सा, रे, गा, मा, प, ध, नि, सा। साज स्वर हमें प्रेरणा देते हैं कि सावधान हो जाओ अर्थात आत्मा की सावधानी रखें। कहीं हमारी आत्मा काम, विचार, राग, द्वेष की भावनाओं के दलदल में फंस तो नहीं रही है। इसका हमें ध्यान रखना चाहिये। मन चंचल है, कहीं परिवर्तित नहीं हो जाए। इसका ध्यान रखना चाहिए।
गुरुवार को उपाध्याय प्रवर केवल मुनि जन्म जयंती मनाई जाएगी। पाथरडी से आए 5 सदस्यों ने सामूहिक रूप से अ_ाई के प्रत्याख्यान लिए।
इस अवसर पर चेन्नई, अम्बातुर, नंजनगुड़, टी नरसीपुर एवं आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में दर्शनार्थी उपस्थित थे। अक्षर मुनि ने तपस्यार्थियों के प्रति मंगलभावना प्रस्तुत की। संघ द्वारा तपस्यार्थियों का सम्मान किया गया।
जिस घर में विवेक नहीं वहां मर्यादा नहीं
बेंगलूरु. धर्मनाथ जैन मंदिर, जयनगर में आचार्य रत्नाकर सूरीश्वर ने प्रवचन में कहा कि जन से जैन बनो। जैन शब्द में दो मात्राएं हैं जो विवेक एवं मर्यादा का प्रतिनिधित्व करती हंै। सबसे पहला गुण विवेक है। आज रहन-सहन, भाषा, खान-पान, वस्त्र से विवेक निकल गया है। आज संसार में सबसे बड़ा अनर्थ हुआ है तो विश्वासघात ने किया है। कपड़े की मर्यादा खत्म हो गयी है। स्थान की मर्यादा अनुसार वेश चाहिए। विवेक का प्रकाश अखंड रहता है। जिस घर में विवेक नहीं उस घर में मर्यादा खत्म हो गयी है।
उन्होंने कहा कि धार्मिक कार्य में अविवेक और आशातना बढ़ी है। आज माता-पिता का सम्मान करने वाले कितने हैं। ऐसे लोग आज समाज में कितने हैं। आज हर घर में अलग बेडरूम, टीवी, डायनिंग है। आज घर में दादा-दादी की उपेक्षा बढ़ी है। जिस समय बालक को देना था वह दिया नहीं, उसका परिणाम आपके सामने है। जिस घर में समूह प्रार्थना नहीं, समूह भोजन नहीं, समूह चर्चा नहीं- वहां समस्याएं होंगी ही।