स्थानीय स्तर पर गठजोड़ की संभावना कम: एक-दूसरे के खिलाफ लड़ेंगे कांग्रेस-जद-एस!
बेंगलूरु. विधानसभा चुनाव के बाद बने कांग्रेस और जद-एस गठबंधन की पहली परीक्षा 108 स्थानीय नगर निकायों के चुनाव में होगी। स्थानीय स्तर पर दोनों पार्टियों के बीच गहरे आपसी मतभेदों को देखते हुए दोनों दल इस बात को महसूस कर रहे हैं कि गठबंधन मुश्किल होगा।
दोनों दलों के गठबंधन से बनी सरकार के बीच अभी तक सबकुछ ठीक नहीं रहा और कदम-कदम पर चुनौतियां आती रही हैं। हालांकि, सरकार अभी तक इन बाधाओं को पार करने में कामयाब रही है लेकिन प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष नेताओं द्वारा खुलेआम जद-एस की आलोचना से मतभेद कम करने की कोशिशों को झटका लगा है।
अब स्थानीय नगर निकायों के चुनाव सामने हैं जिसे राज्य के लोगों की मनोदशा भांपने का सबसे बेहतर मौका माना जाता है। फरवरी 2013 में भी विधानसभा चुनावों से दो महीने पहले स्थानीय नगर निकायों के चुनाव हुए थे और परिणाम में कांग्रेस सरकार के आगमन के संकेत मिल गए थे। हुआ भी वैसा ही राज्य विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। अब आगामी लोकसभा चुनावों से पहले होने जा रहे स्थानीय नगर निकाय चुनावों पर सबकी नजर रहेगी।
चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक सरकार ने वार्ड स्तर पर आरक्षण प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाई है। वार्डों का आरक्षण होते ही स्थानीय नगर निकायों को चुनाव करा लिए जाएंगे। वर्तमान स्थानीय निकायों की कार्यावधि सितम्बर के पहले सप्ताह में समाप्त हो रही है।
इसलिए उचित होगा कि उससे पहले ही चुनाव करा लिए जाएं। उधर, कांग्रेस और जद-एस दोनों इस बात को जानते हैं कि लोकसभा चुनावों में दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन भले ही थोड़ा आसान रहे लेकिन स्थानीय स्तर पर यह गठबंधन लगभग नामुमकिन है क्योंकि दोनों दलों के कार्यकर्ता एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करेंगे।
प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष ईश्वर खंड्रे ने कहा कि नगर निकायों के चुनाव में गठबंधन पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है लेकिन उन्होंने संकेत दिए कि स्थानीय कार्यकर्ताओं के लिए यह मुश्किल होगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस महासचिव और प्रदेश प्रभारी के.सी. वेणुगोपाल का दौरा प्रस्तावित है और वे जिला स्तर के नेताओं से इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे।
खंड्रे ने इस बात को भी स्वीकार किया कि दोनों ही दल लोकसभा चुनावों तक गठबंधन जारी रखना चाहते हैं लेकिन दक्षिण कर्नाटक में जहां कांग्रेस और जद-एस के बीच सीधी टक्कर है वहां कार्यकर्ताओं को समझाना मुश्किल होगा।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिनेश गुंडूराव ने कहा कि पिछली बार वर्ष 2004 से 2006 के बीच जब दोनों पार्टियां गठबंधन में थी तब भी स्थानीय नगर निकायों के चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ी थीं। यह उदाहरण होने के बावजूद पार्टी गठबंधन की दिशा में प्रयास और परामर्श करेगी। दिनेश की अध्यक्षता में शनिवार को जिला कांग्रेस समितियों के पदाधिकारियों की बैठक होगी जिसमें इन चुनावों के बारे में चर्चा होगी।
दूसरी तरफ जद-एस के प्रधान महासचिव कुंवर दानिश अली ने कहा कि स्थानीय नगर निकाय के चुनावों के बारे में अभी कोई चर्चा नहीं हुई। इस मुद्दे पर पहले पार्टी के भीतर चर्चा करेंगे और जरूरत पड़ी तब गठबंधन साझीदार से बात होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि स्थानीय निकायों के चुनाव दोनों ही पार्टियों के लिए अस्तित्व के सवाल हैं।
अगर वे स्वतंत्र दल के रूप में अपनी पहचान कायम रखना चाहते हैं तो उन्हें खुद चुनाव लडऩा होगा। लोकसभा चुनावों में गठबंधन कार्यकर्ताओं के लिए संभव है जहां राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव होते हैं। लेकिन, जनाधार खड़ा करने एवं समर्थकों की जरूरतें पूरी करने के लिए संस्थानों पर स्थानीय संस्थानों पर काबिज होना आवश्यक है। स्थानीय स्तर पर गठबंधन दोनों ही दलों के लिए नुकसान का सौदा साबित होगा जिसका दीर्घकालिक असर भी उनके हितों के खिलाफ होगा।
साथ लडऩे पर जनाधार खोने का भय
दरअसल, परेशानी इस बात को लेकर है कि कांग्रेस को पूरे राज्य में समर्थन प्राप्त है। उसकी मौजूदगी और कार्यकर्ता हर जिले में हैं। लेकिन, जद-एस की का प्रभाव दक्षिणी अंदरुनी जिलों में ही जहां जहां वोक्कालिगा समुदाय का वर्चस्व है। वहीं इन क्षेत्रों में सिर्फ कांग्रेस और जद-एस ही मुख्य ताकत हैं और दोनों एक-दूसरे के चिर प्रतिद्वंद्वी हैं। एक वरिष्ठ जद-एस नेता ने कहा कि इन जिलों में गठबंधन का मतलब है कि भारतीय जनता पार्टी को प्रवेश का मौका देना जिसका प्रभाव तटीय और उत्तरी क्षेत्रों में ही है।
दोनों ही पार्टियां किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं होने देंगी। उनकी प्राथमिकता इन क्षेत्रों से भाजपा को दूर रखना होगा। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि हम जितना अपने कार्यकर्ताओं को स्थानीय स्तर पर जद-एस के साथ मिलकर काम करेंगे उतना ही जनाधार खोने का खतरा भी बढ़ेगा। इससे भाजपा को फायदा मिलेगा।
पुराने मैसूरु क्षेत्र में भाजपा पांव पसारने की कोशिश कर रही है। इस क्षेत्र में कांग्रेस और जद-एस, दोनों की जमीन मजबूत है। उक्त नेता ने कहा कि अगर यहां हम मिलकर लड़ेंगे तो हमें नुकसान उठाना पड़ेगा। हमारे कार्यकर्ता टिकट नहीं मिलने से दूसरे पार्टी में जा सकते हैं या फिर भितरघात की स्थिति बन सकती है जिससे तीसरे पक्ष को फायदा मिलेगा।