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बांसवाड़ा : कानून की कुण्डली से बंद हुई हुनरमंदों की बीन, अब सिर्फ किताबों में ही दिखता है ‘स’ से सपेरा

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बांसवाड़ा : कानून की कुण्डली से बंद हुई सपेरों की बीन, अब सिर्फ किताबों में ही दिखता है ‘स’ से सपेरा

आशीष बाजपेई. बांसवाड़ा. अक्षरमाला में ‘स’ से सपेरा तो सभी ने पढ़ा है और बढ़ती उम्र के साथ गली - मोहल्लों में सांपों के आगे बीन बजाते भी देखा होगा। लेकिन सांपों को बीन की धुन पर नचाने वाले वो हुनरमंद अब नदारद हो चुके हैं। या यूं कहें कि वे अब वे सिर्फ किताबों और जेहन में ही हैं। सांप को देख उनकी नस्ल, उम्र, क्षेत्र आदि की ठोस जानकारी रखने वाले ये लोग आधुनिकता की आंधी की चपेट में आ चुके हैं और यही कारण है कि अब सांपों को पालने और रखने वाले सपेरा जाति के ये लोग इन कामों को पूर्णतया छोड़ चुके हैं।

वन्य जीव सुरक्षा एक्ट के बाद हुई सख्ती
वन विभाग से सेवानिवृत्त डॉ. सतीश शर्मा ने बताया कि वर्ष 1972 में वन्य जीव सुरक्षा एक्ट के बाद से सपेरों पर सख्ती बरती जाने लगी। जिसके बाद धीरे-धीरे इनकी संख्या कम होती गई। अब यह स्थिति है कि इन जातियों की तकरीबन दो पीढिय़ां हो चुकी सांपों को पालने और पकडऩे का काम छोड़े हुए। इस कारण इन जातियों के लोगों का जो पुश्तैनी काम और सांपों के बारे में जानकारी थी वो भी धूमिल हो गई।

नई पीढ़ी बारीकियों से अनभिज्ञ
वागड़ में सांप पकडऩे वाली कनिपा जाति के 40 वर्षीय सोहनलाल बताते हैं कि उनकी जाति में अब कोई सांप पकडऩे या पालने या उन्हें नचाने का कार्य नहीं करता है। हां, बुजुर्ग लोग पहले करते थे। इसलिए अब नई पीढिय़ों में सांप को लेकर कोई विशेष जानकारी नहीं हैं। और कमोबेश यह हाल सभी जगह हैं। अब लोग अन्य कार्य मसलन कम्बल बेचना, कुर्सियां बेचना, भंगार का काम करना आदि कर जीविका चला रहे हैं।

गिने- चुने परिवार ही सांप पालते हैं
कनिपा जाति के लोगों ने बताया कि उनकी जाति के लोग जिले के तकरीबन 55 गांवों में बसे हैं। तकरीबन 500 से 700 परिवार हैं। लेकिन अब इक्का दुक्का ही सांपों को पालने का कार्य करता है। बाकि यह काम अब पूरी तरह बंद हो चुका है।

भांप जाते थे सांप के बारे में सबकुछ
कनिपा समाज के 80 वर्षीय भारता और 75 वर्षीय धुला बताते हैं कि उन्हें सांप पकडऩा भलीभांति आता है। सिर्फ सांपों को पकडऩा ही नहीं बल्कि उनकी बारे में प्रत्येक जानकारी मसलन उनकी नस्ल, उम्र, ***** कहां का सांप है, भूखा है कि नहीं, कितना आक्रामक है, सांप कहां मिल सकता है। किसी स्थान पर है और किस स्थान पर नहीं। और यह कला उन्होंने उनके पिता एवं घर के अन्य बुजुर्ग लोगों से सीखी। साथ ही वे बताते हैं कि वे तो इन कामों में उतने दक्ष नहीं हैं, लेकिन उनके पिता लोग इन कामों को बेहतर ढंग से करते थे। लेकिन अब यह यह जानकारियां खत्म सी हो गई हैं। सख्ती के कारण युवा पीढ़ी ने भी मुंह मोड़ लिया है।

Published on:
10 Aug 2018 03:54 pm