न पीएचसी पर उपचार मिला न ही सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द पर, एमजी आए तो कर दिया रैफर
बांसवाड़ा. नवप्रसूता का आधे से अधिक शरीर जला हुआ और बेतहाशा जलन। परिजन उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले गए लेकिन उपचार नहीं मिला और करीब दस घंटे में बाद उपचार के नाम पर केवल ड्रीप चढ़ाई और रैफर कर दिया। उदयपुर में भी हड़ताल के कारण ऐसे ही हाल होने की बात सुनकर परिजनों ने तब गुजरात के दाहोद का रास्ता पकड़ा।
जिले के अरथूना क्षेत्र के लालपुरा गांव की लक्ष्मी कीमहज 15 दिन के बच्चे की मां लक्ष्मी के कपड़ों में अलाव तापने के दौरान सोमवार रात करीब 9 बजे आग लग गई जिससे उसके कमर के नीचे का हिस्सा बुरी तरह से झुलस गया। इस पर परिजन पहले परतापुर सीएचसी में उपचार के लिए ले गए, लेकिन चिकित्सक नहीं होने से वह बांसवाड़ा के लिए रवाना हुए। बीच में दर्द तेज होने पर तलवाड़ा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर भी उपचार की आस में गए, लेकिन वहां भी चिकित्सक नहीं मिले। इस पर वह मध्य रात्रि बाद करीब डेढ़ से दो बजे महात्मा गांधी चिकित्सालय पहुंचे, लेकिन उपचार नहीं मिला और सुबह तक इंतजार करने को कहा।
मंगलवार सुबह 9 बजे ओपीडी में चिकित्सक पहुंचे तो ड्रीप लगा दी और विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं होने का हवाला देकर मरीज को बाहर ले जाने का फरमान सुना दिया। परिजनों ने यहीं पर उपचार कराने को लेकर काफी मिन्नते की, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा और लक्ष्मी को रेफर कर दिया। चिकित्सकों ने बताया कि 50 फीसदी से अधिक जलने के कारण उसको रेफर किया गया यहां पर अभी कोई विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं हैं।
परिजन बोले -कहां ले जाएं
परिजनों ने कहा कि उदयपुर रेफर कर दिया, लेकिन हालात वहां भी ऐसे ही होने की जानकारी मिली तो मजबूरी में लक्ष्मी को दाहोद ले जाना पड़ा। तीन-तीन अस्पतालों के चक्कर लगाने के बावजूद उपचार नहीं मिल रहा है। आर्थिक तंगी अलग है। मरीज को घंटों बाद भी दर्द से मुक्ति नहीं मिली।
136 डाक्टर हड़ताल पर, वार्डों में वीरानी, आउटडोर मरीज घटे
चिकित्सकों के लगातार आठवें दिन भी हड़ताल पर रहने से मरीजों ने सरकारी चिकित्सालयों से मुंह मोड़ लिया है। वहीं सरकार की सख्ती के बावजूद जिले में हड़ताल पर उतरे किसी चिकित्सक ने मंगलवार को उपस्थिति नहीं दी है। इसके चलते जहां ग्रामीण क्षेत्र में 116 में से केवल 9 चिकित्सक ही कार्यरत रहे वहीं महात्मा गांधी चिकित्सालय वैकल्पिक व्यवस्था के साथ यहां पर 20 चिकित्सक मरीजों को परामर्श दे रहे हैं। हड़ताल के चलते वार्ड वीरान नजर आ रहे हैं एवं इक्का-दुक्का मरीज ही वार्ड में भर्ती हैं। आउटडोर में भी मरीजों की संख्या में बहुत कमी हो गई है एवं जहां पहले रोजाना 1000 से अधिक मरीज उपचार के लिए पहुंचते थे, वह अब 100-150 तक सिमट गई है।