
राजस्थान पुलिस ने एक बार फिर एक दुखद घटनाक्रम के बाद इंसानियत की मिसाल पेश की है। खबर बालोतरा ज़िले से है, जहां पचपदरा पुलिस स्टाफ ने एक भीषण सड़क हादसे में अपने 4 कमाने वाले बेटों को एक साथ खो देने वाले एक परिवार का हाथ थामकर खाकी का ऐसा अनुकरणीय रूप दिखाया है, जिसकी हर तरफ जमकर तारीफ हो रही है। पचपदरा पुलिस ने केवल कानूनी कागजी कार्रवाई तक खुद को सीमित न रखकर, पीड़ित परिवार के दुखों को बांटने के लिए थाने के स्तर पर एक विशेष आर्थिक सहयोग अभियान चलाया।
पीड़ित परिवार की स्थिति को देखते हुए पचपदरा पुलिस थाने की कमान संभाल रही महिला थाना प्रभारी (SHO) गीता चौधरी का दिल पसीज गया। उन्होंने महसूस किया कि इस समय पीड़ित परिवार को केवल कानूनी सांत्वना की नहीं, बल्कि धरातल पर वास्तविक और त्वरित आर्थिक मदद की भी सख्त जरूरत है।
SHO गीता चौधरी ने तुरंत अपने थाने के पूरे स्टाफ के साथ एक अनौपचारिक बैठक की और पीड़ित मेघवाल परिवार की आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए स्वेच्छा से योगदान देने की अपील की। थानाधिकारी की इस संवेदनशील सोच का असर यह हुआ कि कॉन्स्टेबल से लेकर अधिकारियों तक, पचपदरा थाने के पूरे स्टाफ ने अपनी जेब से पैसे मिलाकर कुल 55,400 रुपये की नकद सहायता राशि एकत्रित कर ली।
पचपदरा पुलिस की टीम ने पूरी गरिमा और सम्मान के साथ पीड़ित परिवार के निवास स्थान पर जाकर एकत्रित की गई 55,400 रुपये की यह सहयोग राशि उनके वृद्ध परिजनों को भेंट की। पुलिस कर्मियों ने परिजनों के पास बैठकर उनका हौसला बढ़ाया और आश्वासन दिया कि इस अत्यंत कठिन समय में कानून के रखवाले हर मोड़ पर उनके साथ एक रक्षक और मददगार के रूप में खड़े हैं।
पुलिस विभाग द्वारा उठाए गए इस अप्रत्याशित कदम ने स्थानीय ग्रामीणों के गुस्से और आक्रोश को पूरी तरह से शांत कर दिया। लोगों ने कहा कि पुलिस का काम केवल अपराधियों को पकड़ना या चालान काटना ही नहीं होता, बल्कि समाज में जब कोई परिवार इस कदर टूट जाए तो उसे सहारा देना भी सच्ची खाकी की पहचान है। सोशल मीडिया में पचपदरा पुलिस की इस अनुकरणीय पहल की जमकर सराहना की जा रही है।
बालोतरा जिले के पचपदरा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पाटौदी कस्बे के गोलिया-परऊ सर्किल के पास 16 जून की सुबह एक ऐसा भयावह हादसा हुआ। एक रोडवेज बस और ऑल्टो कार के बीच आमने-सामने से इतनी जबरदस्त और भीषण भिड़ंत हुई कि कार के परखच्चे उड़ गए।
इस दर्दनाक एक्सीडेंट में कार के भीतर सवार 4 सगे भाइयों-जोगाराम, विश्राराम, रेखाराम और उदाराम की मौके पर ही मौत हो गई। ये चारों भाई रोजाना की तरह उस सुबह भी एक साथ मिलकर भवन निर्माण (मजदूरी) के काम पर जा रहे थे ताकि दिनभर हाड़-तोड़ मेहनत करके अपने परिवार का पेट पाल सकें। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और चारों भाई एक साथ दुनिया से विदा हो गए।
कोडूका गांव के इस मेघवाल परिवार के लिए यह वज्रपात से कम नहीं था। घर में बूढ़े माता-पिता और छोटे बच्चों के भरण-पोषण की पूरी जिम्मेदारी इन्हीं 4 भाइयों के कंधों पर टिकी हुई थी। एक ही झटके में घर के चारों कमाऊ सदस्यों की अर्थियां एक साथ उठने से पूरा गांव रो पड़ा।
हादसे के बाद जहां एक तरफ स्थानीय ग्रामीणों और परिजनों में सड़क पर उचित सुरक्षा उपाय, जैसे स्पीड ब्रेकर न होने को लेकर गहरा आक्रोश और नाराजगी व्याप्त थी, वहीं दूसरी तरफ परिवार के सामने आर्थिक रूप से जीवन जीने का एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया था। परिवार पूरी तरह से टूट चुका था और घर में सांत्वना देने वालों की भारी भीड़ जमा थी।