राजस्थान के सीमावर्ती रेगिस्तानी इलाकों में आज भी पानी के लिए लोगों की रोज ‘जंग’ जारी है। महिला-पुरुष एक घड़ा पानी लाने के लिए 3 से 4 मील पैदल चलने को मजबूर हैं। बॉर्डर विकास के नाम पर करोड़ों खर्च होने के बावजूद कई गांवों तक आज तक पेयजल नहीं पहुंच पाया।
गडरारोड (बाड़मेर): पश्चिमी सीमा पर इन दिनों सूरज आग उगल रहा है। लू के थपेड़े अग्नि की लपटों जैसे हैं और जमीन तवे की तरह तपी हुई है। बालू रेत का कण-कण तपकर लाल हो चुका है। भीषण गर्मी की तपती दोपहरी में सीमावर्ती गांवों के महिला-पुरुष दो-दो घड़े सिर पर उठाए चलते हैं। वे पसीने से पूरे लथपथ हैं। उनके चेहरे से पसीने की बूंदें ऐसे टपकती हैं, जैसे वे अभी नहाकर आए हों।
उस पर भीषण गर्मी से लाल चेहरा और हांफती सांसें। एक घड़े पानी के लिए तीन से चार मील पैदल चलते इन महिला-पुरुषों को देखकर आंखों में पानी आ जाए। रेगिस्तान के सीमावर्ती इलाके में बॉर्डर विकास पर करोड़ों रुपए खर्च हुए हैं। लेकिन पानी की स्थिति 200 से अधिक गांवों में जस की तस बनी हुई है।
सरकारी योजनाएं अब तक केवल पाइपलाइन ही बिछा पाई है। इसमें आने वाला पानी तो ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। ग्रामीणों के लिए हर घर नल से जल योजना मृग मरीचिका बनी हुई है। नर्मदा का पानी 2022 में जब रामसर पहुंचा तो लगा था कि अब यह बॉर्डर के सुदूर गांवों और ढाणियों सहित हर घर तक पहुंच जाएगा।
लेकिन हालात यह हैं कि नर्मदा का पानी रामसर के गांवों और ढाणियों तक भी ठीक से नहीं पहुंच पाया है। विभागीय अधिकारी चाहे कितनी भी वाहवाही लूट लें, हकीकत यह है कि किसी भी पूरे गांव या ढाणी में नर्मदा का पानी नहीं पहुंच पाया है।
केवल आसपास के ट्यूबवेल के पानी को ही टेस्टिंग के नाम पर चलाकर दिखाया जा रहा है। नहरी पानी 2018 में आने का दावा किया गया था, जो अब 2026 तक भी सपना ही बना हुआ है। ऐसे में सीमावर्ती लोग पारंपरिक बेरियों से ही प्रतिदिन पानी के लिए जंग लड़ रहे हैं।
ग्राम पंचायत बिजावल के गड्स गांव के प्रह्लाद सिंह, नाथू सिंह, वैन सिंह, गणेश सिंह और गेन सिंह बताते हैं कि वे आज भी 18वीं सदी में जीने को मजबूर हैं। गांव में बिजली नहीं आई है और ग्रेवल सड़क तक नहीं बन पाई है। पानी के लिए बेरियां ही जीवन का आधार बनी हुई हैं। यह इलाका पक्की सड़क, बिजली और मोबाइल नेटवर्क सहित मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह महरूम है।
एक सदस्य का काम केवल पानी लाना है, तीन मील दूर ढाणी है। रोज यहां बेरी पर आता हूं। यहां से पानी लेकर घर जाना होता है। परिवार का एक सदस्य केवल पानी लाने का ही काम करता है।
-वैन सिंह सोढ़ा, ग्रामीण, गांव गड़स
अफसरों और नेताओं को क्या यह मालूम नहीं है? बैठकें तो हर सात दिन में होती हैं। सब जानते हैं, लेकिन समाधान कोई नहीं करवा रहा है। इनके पीछे घूमेंगे तो अगले दिन चार घड़े ज्यादा पानी लाना होगा।
-जगमाल सिंह राजपुरोहित, ग्रामीण, गड़स (बिजावल)
गड़स गांव के लिए ट्यूबवेल का प्रपोजल बनाकर भेजा हुआ है। स्वीकृति मिलने के बाद खुदाई करके राहत दी जाएगी। जेजेएम के अंतर्गत आधे घरों में पानी पहुंच रहा है। गांव में कमेटी बनाकर आदमी रखा जाएगा, जिसके बाद नियमित आपूर्ति के प्रयास करेंगे।
-शिवम शिवहरे, कनिष्ठ अभियंता जलदाय विभाग गडरारोड