रेगिस्तान में पड़ रही भीषण गर्मी अब इंसानों के साथ बेजुबान पशुओं पर भी कहर बनकर टूट रही है। रामसर क्षेत्र के देरासर गांव में पानी के अभाव ने हालात इतने भयावह कर दिए हैं कि जलकुंड सूख चुके हैं और प्यास से तड़पकर पशुधन दम तोड़ रहा है।
रामसर (बाड़मेर): पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले में आसमान से बरसती आग अब इंसानों के साथ-साथ बेजुबान पशुओं के लिए भी काल बनने लगी है। रामसर क्षेत्र के देरासर गांव में पानी के अभाव ने हालात बेहद भयावह कर दिए हैं। गांव के सभी जलकुंड पूरी तरह सूख चुके हैं, जिससे प्यास से तड़पकर पशुधन लगातार दम तोड़ रहा है। नहरी सप्लाई बंद होने और समय पर पानी के टैंकर नहीं पहुंचने के कारण ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।
ग्रामीणों के अनुसार, पिछले करीब 10 दिनों से इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) की सप्लाई पूरी तरह बंद है। जन स्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग (PHED) की घोर लापरवाही के चलते अब तक गांव में पानी के वैकल्पिक टैंकर भी नहीं भेजे गए हैं।
देरासर के रामदियों की बस्ती में पानी नहीं मिलने की वजह से अब तक एक दर्जन से अधिक आवारा पशुओं की मौत हो चुकी है। स्थानीय लोगों ने बताया कि इस इलाके में विशाला क्षेत्र से पानी की सप्लाई की जाती है। पिछले कई दिनों से यह आपूर्ति बाधित है और आसपास कोई दूसरा जल स्रोत नहीं होने के कारण बेजुबान जानवर बूंद-बूंद पानी के लिए भटकने को मजबूर हैं।
गांव में बने दो-तीन बड़े जलकुंडों को पहले ट्यूबवेल और जल जीवन मिशन (JJM) की सप्लाई से भरा जाता था। लेकिन पिछले दो सप्ताह से पेयजल आपूर्ति पूरी तरह ठप होने से ये सभी कुंड मैदान में तब्दील हो चुके हैं।
ग्रामीण अजीज खान ने बताया कि करीब 10 दिन पहले उन्होंने खुद रामसर स्थित पीएचईडी कार्यालय जाकर अधिकारियों को जमीनी हकीकत से अवगत कराया था। उस समय अधिकारियों ने तुरंत टैंकर भिजवाने का आश्वासन दिया था, लेकिन हकीकत यह है कि आज तक गांव में एक भी टैंकर नहीं पहुंचा है। देरासर में अब चारे और पानी दोनों का संकट गहराता जा रहा है, जिससे आवारा पशुओं की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
अजीज खान (ग्रामीण, देरासर): दस दिन पूर्व रामसर पीएचईडी के अधिकारियों को समस्या बताई थी, लेकिन अब तक पानी का एक भी टैंकर नहीं आया। पानी के अभाव में आवारा गायें प्यासी मर रही हैं। हमारी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
एहसान खान (ग्रामीण, देरासर): अधिकारियों ने दो दिन में टैंकर भेजने का वादा किया था, लेकिन 10 दिन बीत जाने के बाद भी हालात जस के तस हैं। बेजुबान गायें मर रही हैं, प्रशासन को जल्द से जल्द सप्लाई शुरू करनी चाहिए।
अरशद खान (सरपंच, देरासर): देरासर में चारे-पानी का भारी अकाल पड़ गया है। पाताल (भूजल) का पानी सूख चुका है और इंदिरा गांधी नहर परियोजना की सप्लाई भी बंद है। प्रशासन को पशुओं के जीवन की रक्षा के लिए तत्काल पुख्ता इंतजाम करने होंगे।
जब इस गंभीर संकट को लेकर जलदाय विभाग के उच्चाधिकारियों से संपर्क किया गया, तो उन्होंने आगे से ही सप्लाई बंद होने का हवाला दिया। बाड़मेर लिफ्ट कैनाल में आगे से पानी की सप्लाई बंद है। यदि देरासर गांव में ऐसी गंभीर स्थिति बनी हुई है, तो मैं तुरंत पता करवाता हूं और टैंकरों के माध्यम से वहां पानी पहुंचाया जाएगा। रही बात जेजेएम (जल जीवन मिशन) की, तो वह मामला अलग है और उसके एसई (अधीक्षण अभियंता) अलग बैठते हैं।
-हंजारी राम बालवा, अधीक्षण अभियंता, जलदाय विभाग, बाड़मेर
भीषण गर्मी, तपती रेत, प्यासे कंठ और टैंकरों पर पानी की होड़…ऐसे हालात में एक तस्वीर सामने आती है…सूखी धरती पर बिखरीं गोवंश की लाशें। सूखे जलकुंड में फंसी कंकाल बनतीं चमड़ियां…हुक्मरानों और अफसरों की नाकामी चीख-चीखकर बयां कर रही हैं।
रेगिस्तान में जलसंकट और मरुधरा की रूह को छलनी कर देने वाला यह कड़वा सच है। हालात इस कदर खौफनाक हो चुके हैं कि देरासर गांव की तस्वीरें देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान का कलेजा कांप उठे। जहां इंसान एक-एक घड़े के लिए जद्दोजहद कर रहा है। वहीं, वहां का असली धन, बेजुबान पशु अब तड़प-तड़पकर दम तोड़ रहा है।
झकझोरने वाली बात यह है कि सजग ग्रामीणों ने समय रहते अफसरों को चेताया भी, लेकिन रसोड़े में बैठी नौकरशाही के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। दस दिन पहले समस्या बताई गई, आश्वासन के झुनझुने थमाए गए, मगर रेगिस्तान के धोरों तक एक टैंकर पानी नहीं पहुंच सका।
बेजुबान प्यासे मर गए और अफसरों का रटा-रटाया बयान आता है- पता करवाता हूं, जेजेएम का मामला अलग है। उसके एसई अलग बैठते हैं। वाह साहब! जनता और बेजुबान प्यास से मरें और आप विभागों की सीमाओं का गणित समझाएं? इस संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पर आखिर पर्दा कब तक डाला जाएगा?
शहर की तस्वीर भी अच्छी नहीं है। कॉलोनियों, मोहल्लों में पैसा खर्च कर जनता टैंकर मंगवाने को मजबूर हैं। शहर से लेकर सरहदी ढाणियों तक पेयजल संकट का यह हाहाकार कोई अचानक आई आपदा नहीं है। यह हमारे कर्ताधर्ताओं, अफसरों, विभाग की घोर लापरवाही, दूरदर्शिता की कमी और 'गर्मी की कार्य योजना' के नाम पर की जाने वाली कागजी लीपापोती का सीधा नतीजा है।
जब जनता त्राहि-त्राहि करती है, तो नेता और विधायक जनसुनवाई में अधिकारियों को कैमरे के सामने डांटकर अपनी राजनीति चमका लेते हैं। लेकिन सवाल यह है कि बड़ी पेयजल परियोजनाओं की जमीनी समीक्षा समय रहते क्यों नहीं की गई?
कडाणा बांध से हर साल अरबों लीटर पानी व्यर्थ बह जाता है, लेकिन उसे सिवाना या बालोतरा तक लाने की इच्छाशक्ति किस सरकार ने दिखाई? जल जीवन मिशन के करोड़ों के बजट के दावों के बीच यदि देरासर की ढाणियों में मवेशी कंकाल बन रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र की आपराधिक लापरवाही है।
अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। बयानों और आश्वसनों के टैंकर नहीं, बल्कि धरातल पर तुरंत पानी की सप्लाई चाहिए। अगर सरकार और प्रशासन ने अब भी अपनी कुंभकर्णी नींद नहीं तोड़ी, तो थार का यह सूखा केवल पशुधन को ही नहीं, बल्कि मरुस्थलीय सभ्यता और मानवीय संवेदनाओं को निगल जाएगा। साहब, 'पता करवाने' का वक्त बीत चुका है, अब प्यासे कंठों तक पानी पहुंचाइए, वरना जनता कभी माफ नहीं करेगी।