
बाड़मेर के ग्रामीण एरिया में आक को एकत्र करते किसान (पत्रिका फोटो)
बाड़मेर: राजस्थान के थार रेगिस्तान की बंजर जमीन पर उगने वाला 'आक' का पौधा अब ग्रामीणों और विशेषकर महिलाओं की किस्मत बदल रहा है, जिसे कल तक लोग सिर्फ एक बेकार खरपतवार (झाड़ी) समझते थे, आज वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन रहा है। रूमा देवी फाउंडेशन और उत्तर भारत वस्त्र अनुसंधान संघ (निट्रा) की एक खास पहल 'आक से आमदनी' ने हजारों किसान परिवारों के घरों में समृद्धि ला दी है।
इस अनोखी पहल से न सिर्फ पर्यावरण को फायदा हो रहा है, बल्कि रेगिस्तान की चुनौती को एक बेहतरीन अवसर में बदल दिया गया है। आइए जानते हैं कि यह पूरी योजना क्या है और इससे लोगों को किस तरह लाभ मिल रहा है।
आक (वैज्ञानिक नाम: कैलोट्रोपिस गिगेंटिया) एक औषधीय और मरुस्थलीय पौधा है, जिसे आम भाषा में 'आकड़ा' या 'मदार' भी कहा जाता है। यह रेतीली और सूखी जमीन पर अपने आप उगता है। इस पौधे में लगने वाले पोड्स (डोडे या फल) से प्राकृतिक रेशे निकलते हैं।
निट्रा के निदेशक के. के. परमार के अनुसार, इन प्राकृतिक रेशों से अब बैग, जैकेट, स्वेटर, शॉल और कई तरह के गर्म कपड़े तैयार किए जा रहे हैं। ये कपड़े इतने असरदार हैं कि -20 से -40 डिग्री जैसे जमा देने वाले तापमान में भी शरीर को पूरी तरह गर्म रख सकते हैं।
आक का पौधा मुख्य रूप से पश्चिमी राजस्थान के थार रेगिस्तान वाले इलाकों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। बाड़मेर जिला इसका मुख्य केंद्र बनकर उभरा है। इसके अलावा जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर और जालौर जैसे रेतीले व बंजर भूमि वाले जिलों में यह पौधा आसानी से देखने को मिल जाता है। अब फाउंडेशन के प्रयासों से किसान इसकी व्यावसायिक खेती भी करने लगे हैं।
रूमा देवी ने बताया कि आक का पौधा एक बार लगाने के बाद 10 से 12 साल तक लगातार पोड्स (रेशे वाले फल) देता है। यानी एक बार की मेहनत से सालों तक कमाई होती है। बाड़मेर और आसपास के जिलों की ग्रामीण महिलाएं पोड्स तोड़ने और उनसे रेशा निकालने का काम कर रही हैं। रूमा देवी फाउंडेशन महिला स्वयं सहायता समूहों को इसके लिए विशेष ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) दे रहा है, जिससे महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।
किसानों के लिए सबसे बड़ी सुविधा यह है कि जब वे निर्धारित मात्रा में पोड्स इकट्ठा कर लेते हैं, तो फाउंडेशन सीधे उनके खेत से ही माल उठा लेता है। इससे किसानों का ट्रांसपोर्ट का खर्चा बच जाता है। खेती-बाड़ी के साथ-साथ अब किसान परिवार इस बेकार समझी जाने वाली झाड़ी से अतिरिक्त और स्थाई कमाई कर रहे हैं।
रूमा देवी फाउंडेशन की क्षमता अब 500 टन से अधिक रेशा इकट्ठा करने की हो चुकी है। रूमा देवी का कहना है कि जो आक कभी बेकार और अनुपयोगी माना जाता था, आज वही गांवों में रोजगार, उम्मीद और कमाई की एक नई पहचान बन चुका है। फाउंडेशन का लक्ष्य इस सफल बिजनेस मॉडल को रेगिस्तान के हर कोने-कोने तक पहुंचाना है, ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्रामीण परिवारों को सशक्त बनाया जा सके।
Published on:
17 May 2026 11:35 am
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