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राजस्थान का वह रेगिस्तानी गांव, जहां पानी की कमी ने भारत को परमाणु शक्ति बनने में मदद की

क्या किसी इलाके में पानी की कमी कभी वरदान बन सकती है? राजस्थान के जैसलमेर जिले के एक छोटे से रेगिस्तानी गांव खेतोलाई के मामले में यह बिल्कुल सच साबित हुआ। इस गांव की अनोखी भूगर्भीय संरचना के कारण इसका नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया।

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Pokhran nuclear test

पोकरण परमाणु परीक्षण के पीछे था राजस्थान के इस गांव का बड़ा राज (पत्रिका फोटो)

जैसलमेर: मई 1998 में हुए पोकरण परमाणु परीक्षण धोरों के गांव खेतोलाई का चयन किसी संयोग का परिणाम नहीं था। इसके पीछे वर्षों का भू-वैज्ञानिक अध्ययन, रेडिएशन नियंत्रण की रणनीति और धरती की आंतरिक संरचना का गहरा विश्लेषण शामिल था। 11 और 13 मई 1998 को पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज में पांच परमाणु विस्फोट किए गए थे। परीक्षण स्थल से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित खेतोलाई गांव अचानक सुर्खियों में आ गया।

बता दें कि परीक्षणों के बाद यह इलाका भारत की सामरिक ताकत का प्रतीक बनकर उभरा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल चट्टानें ही नहीं, बल्कि ऊपर फैली रेत और लाठी सैंड स्टोन की मोटी परत भी परीक्षणों के लिए अहम रही। विस्फोट के दौरान पैदा होने वाले कंपन्न को यह परत काफी हद तक अवशोषित कर लेती हैं। यही वजह रही कि परीक्षणों के बाद सतही प्रभाव सीमित दिखाई दिए।

इसलिए उपयुक्त साबित हुआ खेतोलाई गांव

परमाणु परीक्षणों में सबसे बड़ी चुनौती रेडिएशन को भूमिगत सीमित रखना होती है। यदि रेडिएशन भू-जल तक पहुंच जाए तो उसका प्रभाव बड़े भूभाग पर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने इसी खतरे को ध्यान में रखकर ऐसे भू-भाग की तलाश की, जहां भूमिगत जल बेहद कम हो और चट्टानी संरचना रिसाव रोक सके। खेतोलाई इस कसौटी पर सटीक बैठा।

भू-संरचना बनी सबसे बड़ी ताकत

  • जमीन में रायोलाइट चट्टानें जो ज्वालामुखीय लावा के तेजी से ठंडा होने पर बनती हैं।
  • इन चट्टानों के कण अत्यंत सघन होते हैं, जिनके बीच रिक्त स्थान लगभग नहीं रहता।
  • जल संचयन और जल प्रवाह नहीं होने से रेडिएशन फैलने का खतरा बेहद कम हो गया।
  • पोकरण फायरिंग रेंज के नीचे यही भू-संरचना परीक्षणों की सबसे बड़ी सुरक्षा ढाल बनी।

पानी की कमी कैसे बनी वरदान?

वैज्ञानिकों ने परमाणु परीक्षण के लिए खेतोलाई क्षेत्र को इसलिए चुना, क्योंकि इस इलाके में जमीन के नीचे हजारों मीटर तक भूमिगत जल का नामोनिशान नहीं था। भूमिगत परमाणु परीक्षणों के लिए इस भूगर्भीय विशेषता को आदर्श माना जाता है।

क्योंकि यदि जमीन के नीचे पानी का प्रवाह हो, तो विस्फोट के बाद रेडियोधर्मी संदूषण पानी के जरिए दूर-दूर तक फैलने का खतरा बढ़ जाता है। विडंबना यह है कि जिस खेतोलाई गांव के नीचे पानी नहीं है, वहां आज भी पीने का पानी करीब 30 किलोमीटर दूर 'लाठी' गांव से पाइपलाइनों के जरिए सप्लाई किया जाता है।

क्यों खास है यहां की चट्टानें?

भूजल वैज्ञानिकों का मानना है कि राजस्थान के करीब 33,000 गांवों में से खेतोलाई अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति के कारण सबसे अलग है। उनके अनुसार, पोकरण परीक्षण के लिए चुना गया। यह क्षेत्र करोड़ों साल पहले ज्वालामुखी के लावे से बना था, जिससे यहां 'रायओलाइट' संरचना वाली ज्वालामुखीय चट्टानें बनीं।

पिघले हुए लावे के बेहद बारीक कणों से बनी ये चट्टानें इतनी सघन और ठोस होती हैं कि इनके बीच कोई खाली जगह नहीं बचती। इस वजह से ये न तो पानी सोखती हैं और न ही इनके अंदर से पानी बह सकता है।

ये चट्टानें परमाणु विस्फोटों के लिए सबसे सुरक्षित होती हैं। क्योंकि धमाके के बाद निकलने वाला रेडियोधर्मी पदार्थ भूजल में नहीं मिल पाता। खेतोलाई में 2,000 मीटर की गहराई के बाद भी पानी का कोई संकेत नहीं है।

पर्यटकों और शोधकर्ताओं का केंद्र

आज खेतोलाई दुनिया भर के लोगों के लिए ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व का स्थान बन चुका है। पोकरण में एशिया की सबसे बड़ी फील्ड फायरिंग रेंज के अंदर स्थित परमाणु परीक्षण स्थल से यह गांव महज 2.5 किलोमीटर दूर है।

यहां अक्सर सैलानी, पत्रकार और शोधकर्ता भारत के परमाणु इतिहास को समझने आते हैं। जब भी कोई बाहरी व्यक्ति गांव में आता है, तो स्थानीय लोग बड़े गर्व से बताते हैं कि कैसे पांच भूमिगत धमाकों ने दुनिया को हिला दिया था और भारत को परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा कर दिया था।

खेतोलई में कड़ी सुरक्षा

आज भी परमाणु परीक्षण स्थल सेना की सख्त सुरक्षा में है। जहां जाने के लिए चार कड़े सुरक्षा द्वारों से गुजरना पड़ता है। अंतिम छोर पर 'कोहिनूर गेट' को पार करने के बाद वह ऐतिहासिक मैदान देखा जा सकता है, जिसके नीचे परमाणु विस्फोट किए गए थे।

बताते चलें कि पोकरण परीक्षण को बेहद गोपनीय रखा गया था। देश के महान मिसाइल वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम इस मिशन की तैयारियों की निगरानी के लिए सेना की वर्दी में, अपनी पहचान छिपाकर दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ दो महीने से अधिक समय तक खेतोलई रेंज में रहे थे।

इस कड़ी गोपनीयता का नतीजा यह था कि अमेरिका की केंद्रीय खुफिया एजेंसी सहित दुनिया की बड़ी खुफिया एजेंसियां भी भारत की तैयारियों की भनक नहीं लगा पाई थीं। बाद में इसे सीआईए की सबसे बड़ी खुफिया विफलताओं में से एक माना गया। खेतोलाई के लिए पानी की यही कमी दुनिया के इतिहास में उसकी कभी न मिटने वाली पहचान बन गई।