लीला कंवर के दोनों हाथ नहीं हैं, फिर भी उन्होंने पैरों से लिखकर बीए तक की पढ़ाई पूरी की। एसटीसी में चयन के बाद फीस जमा की, लेकिन प्रवेश से इनकार कर दिया गया। हर सरकारी दरवाजे पर ‘रिजेक्ट’ का ताला लगा है। सवाल है यह नीति की भूल है या सिस्टम की संवेदनहीनता?
बाड़मेर: मैं लीला कंवर हूं। मेरे पास हाथ नहीं हैं, लेकिन हौसला है। बचपन में एक हादसे ने मेरे दोनों हाथ छीन लिए, पर मेरी पढ़ने-लिखने की जिद नहीं छीन सका। मैंने पैरों से लिखना सीखा। वही पैर मेरी कलम बने, वही मेरी पहचान। 10वीं पास की, 12वीं पास की और बीए किया। कंप्यूटर सीखा और कीबोर्ड पर पैर रखकर भविष्य टाइप किया।
मैंने सोचा था शिक्षक बनूंगी। बच्चों को पढ़ाऊंगी, ताकि वे कभी किसी को उसकी कमी से न आंकें। एसटीसी परीक्षा दी, चयन हुआ, बोरुंदा जोधपुर का सेंटर मिला। फीस जमा की। मुझे लगा, अब मेरी मेहनत रंग लाई। लेकिन जब संस्थान पहुंची तो कहा गया…आप पढ़ा नहीं सकतीं, नियम इसकी इजाजत नहीं देते। मेरी फीस लौटा दी गई, पर मेरा आत्मसम्मान वहीं छूट गया। कहा गया, चयन में गलती हो गई।
गलती मेरी नहीं थी, मेरी मेहनत की नहीं थी, गलती उस सिस्टम की थी, जिसने पहले फॉर्म भरवाया, परीक्षा दिलवाई और फिर मुझे अयोग्य ठहरा दिया। लेकिन मैंने सरकारी नौकरी का सपना फिर देखा। लैब असिस्टेंट, पोस्ट ऑफिस का फॉर्म भरने गई। हर बार एक ही जवाब मिला- रिजेक्ट।
मैं पूछना चाहती हूं, क्या मैं इसलिए अयोग्य हूं क्योंकि मेरे हाथ नहीं हैं? क्या मेरी योग्यता मेरे शरीर से बड़ी नहीं हो सकती? अगर मैं पैरों से लिख सकती हूं, स्कैच बना सकती हूं, कंप्यूटर चला सकती हूं, परीक्षा पास कर सकती हूं, तो मैं सरकारी नौकरी क्यों नहीं कर सकती? मैं भी इस देश की बेटी हूं। मुझे भी नौकरी चाहिए, दया नहीं, अवसर चाहिए।
इस दौरान पास ही बैठे पिता भूर सिंह की आंखे नम हो गईं। वे बताते हैं कि किस तरह उनकी बेटी संघर्ष कर रही है। शुक्रवार को बेटी लैब असिस्टेंट का फॉर्म भरने गई थी। लेकिन नहीं भर पाई। पिता को भावुक देख लीला की आंखे भी डबडबा आईं।
लीला कंवर का संघर्ष सरकारी नीतियों के मानवीय खोखलेपन को उजागर करता है। दिव्यांगता को आज भी योग्यता से ऊपर रखा जा रहा है। चयन, परीक्षा और फीस के बाद प्रवेश से इनकार व्यवस्था की संवेदनहीनता है।
सवाल यह नहीं कि दिव्यांग क्या नहीं कर सकते, सवाल यह है कि सरकार उन्हें करने क्यों नहीं देती। नीतियां अगर हौसले के साथ नहीं बदलेंगी, तो दिव्यांगो के उत्थान की बातें सिर्फ कागजों में ही रह जाएगी।
दिव्यांगजन के संदर्भ में सरकारी नौकरियों की पात्रता केवल शैक्षणिक योग्यता से तय नहीं होती, बल्कि कार्य की प्रकृति और दिव्यांगता की श्रेणी के अनुसार निर्धारित नियमों पर आधारित होती है।
शिक्षण जैसे पेशों में सामान्यतः ऊपरी अंगों की कार्यात्मक क्षमता आवश्यक मानी जाती है, क्योंकि इसमें ब्लैकबोर्ड पर लिखना, शैक्षणिक सामग्री संभालना, विद्यार्थियों की गतिविधियों का संचालन करना जैसी जिम्मेदारियां शामिल होती हैं।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे अभ्यर्थियों के लिए सरकारी सेवाओं के अवसर बंद हैं। विभिन्न विभागों में सामान्य प्रशासनिक, लिपिकीय तथा अन्य उपयुक्त पदों के लिए वे आवेदन कर सकते हैं, जहां कार्य की प्रकृति उनकी क्षमताओं के अनुरूप हो।
नियमों का उद्देश्य किसी को हतोत्साहित करना नहीं है। सरकार का प्रयास रहता है कि दिव्यांगजन को अधिकतम अवसर मिलें, लेकिन यह अवसर नियमानुसार निर्धारित श्रेणियों और पदों के अनुरूप ही दिए जा सकते हैं।
-सुरेंद्र प्रताप सिंह, एडिशनल डायरेक्टर, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, बाड़मेर