Inspirational Story : राजस्थान के बाड़मेर जिले के एक छोटे गांव रावतसर की रूमा देवी ने अपनी सफलता के लिए अपने हुनर को अपना हथियार बनाया। आज रूमा फैशन डिजाइनर के तौर पर पहचानी जाती हैं। यहीं नहीं रूमा ने हजारों महिलाओं के सपने साकार किए। पढ़िए बाड़मेर की रूमा देवी की सफलता की कहानी।
Inspirational Story : राजस्थान के बाड़मेर जिले के एक छोटे गांव रावतसर की रूमा देवी ने अपनी सफलता के लिए अपने हुनर को अपना हथियार बनाया। आज रूमा फैशन डिजाइनर के तौर पर पहचानी जाती हैं। यहीं नहीं रूमा ने हजारों महिलाओं के सपने साकार किए और उन्हें आत्मनिर्भर भी बनाया। पढ़िए बाड़मेर की रूमा देवी की सफलता की कहानी, यह कहानी तमाम लोगों के लिए प्रेरणादायक भी है।
रूमा देवी की कहानी बाड़मेर जिले के एक छोटे गांव रावतसर से शुरू होती है। जन्म से लेकर शादी तक सिर्फ परेशानियां ही परेशानियां। इन परेशानियों की एक लम्बी लाइन है। गरीबी, सामाजिक रूढ़ियां, पुरुष प्रधान समाज, व्यक्तिगत त्रासदियां इनका सामना धैर्य, मेहनत और समझदारी से कर रूमा देवी ने सफलता के झंडे लहराया दिए हैं। अब वो राजस्थान की एक पहचान बन गई हैं।
बाड़मेर जिले के गांव रावतसर में रूमा देवी का जन्म साल 1988 में हुआ। 4 साल की उम्र में मां नहीं रहीं। उनका पालन पोषण चाचा-चाची और दादी ने किया। आर्थिक तंगी की वजह से सिर्फ कक्षा आठवीं तक पढ़ाई कर सकी। मात्र 17 वर्ष की उम्र में शादी कर दी गई। यहां भी हालात कुछ ठीक नहीं थे। ऐसे हालात में रूमा देवी ने अपने नवजात बेटे को खो दिया। इसके बाद रूमा देवी ने ठान लिया कि अब उसे सफल होना है।
रूमा देवी को बचपन से कढ़ाई का शौक था। यह हुनर उसे अपनी दादी से विरासत में मिला था। बहुत सोच समझकर रूमा ने सिलाई-कढ़ाई को अपना हथियार बनाया। साल 2006 में अपने गांव की 10 महिलाओं को जोड़कर स्वयं सहायता समूह की शुरुआत की। सभी से 100-सौ रुपए एकत्र कर धागे, कपड़े और पुरानी मशीन खरीदी। फिर क्या किस्मत बदलनी शुरू हुई। समूह की महिलाओं ने मिलकर हस्तशिल्प उत्पाद बनाने शुरू किए। 2010 तक इस एनजीओ से पांच हजार महिलाएं से जुड़ गईं थी।
रूमा देवी बताती हैं दिक्कतें कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। राजस्थान के बाहर मार्केट के लिए दिल्ली गए। पढ़े-लिखे थे तो नहीं थे। फिर भाषा की समस्या। न तो हिंदी आती थी न इंग्लिश, सिर्फ गांव की बोली और मारवाड़ी में बात करना जानते थे।
फिर भी रूमा ने दिल्ली में स्टॉल लगाया। 15 से 20 हजार रुपए की सेल हुई। साथ में काफी सपोर्ट और हैंडीक्राफ्ट की तारीफ मिली। वर्ष 2011 में एक बार फिर दिल्ली में नए बदलाव के साथ गईं। इस बार रूमा देवी ने कुछ प्रयोग शुरू किया। पारंपरिक कशीदाकारी को आधुनिक फैशन से जोड़ा। जबरदस्त मार्केटिंग की वजह से करीब 11 लाख रुपए की सेल हुई।
इसके बाद तो मेहनत और हुनर बोलने लगा। उनके बनाए गए कुर्ते, साड़ियां, कपड़े, दुपट्टे स्थानीय बाजारों में ही प्रसिद्ध नहीं हुए बल्कि सिंगापुर, कोलंबो, जर्मनी जैसे अंतरराष्ट्रीय फैशन शो में अपनी धाक जमाने लगे। साल 2015 में राजस्थान हेरिटेज वीक में रूमा देवी के कलेक्शन को रैंप पर उतरा गया। जिसे खूब सराहा गया।
रूमा देवी के नेतृत्व में चल रहा संस्थान राजस्थान के 75 से अधिक गांव की 40000 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षण और रोजगार में मदद कर रहा है। रूमा अपने हुनर की बदौलत महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं।
अपनी मेहनत और हुनर के बदौलत रूमा देवी की झोली में ढेर सारे सम्मान आए। रूमा देवी को साल 2018 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्ष 2019 में केबीसी की हॉट सीट पर बैठ कर इनाम भी जीतीं। ज्योतिराव फुले यूनिवर्सिटी जयपुर ने उन्हें पीएचडी की मानद उपाधि दी। श्रीलंका सरकार ने शिल्पा अभिमन्यु पुरस्कार दिया। साल 2024 में टेक्सास के एक समारोह में गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में आमंत्रण मिला था।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में लेक्चर देकर रूमा ने अपना जलवा दिखाया। रूमा देवी के सम्मान की फेहरिस्त काफी लम्बी है। इसके साथ ही वह 'शी इज डिजिटल इंडिया' के तहत महिलाओं को डिजिटल शिक्षा देने में भी अहम रोल अदा कर रहीं हैं।