बाड़मेर

थार में बढ़ रहा है एचआईवी का ख़तरा, पिछले पांच साल में इतने बढे मरीज

- थार के रेगिस्तान में लगातार बढ़ रहे है रोगी

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Dec 01, 2017

बाड़मेर.थार के रेगिस्तान में एचआईवी का मर्ज लगातार बढ़ रहा है। पिछले साल यह आंकड़ा 1001 था जो इस साल बढ़कर 1248 पहुंच गया है। हर माह पंद्रह से बीस मरीजों का बढऩा और मौत का आंकड़ा प्रतिवर्ष 50 से अधिक पहुंचना एचआईवी को लेकर लोगों की बेफिक्री और स्वच्छंद जीवन शैली को एक कारण माना जा रहा है। अब तक अनपढ़ और कम शिक्षित लोग ही इसके रोगी मिले है लेकिन इस बार पढ़े लिखे और नौकरीपेशा भी एचआईवी की गिरफ्त में आने के मामले सामने आए हैं।

जीवन से हार फिर मिलती है पालनहार
एचआईवी पीडि़त बच्चों को पालनहार योजना से जोड़ा गया है लेकिन बजट के अभाव व तकनीकी खामियों के चलते पालनहार योजना की राशि महीनों बाद मिलती है। एेसे में कई एचआईवी की वजह से दम तोड़ जाते है। पालनहार योजना की राशि इन बच्चों को हर माह भुगतान करने की सुविधा की मांग की गई है लेकिन विभाग एेसा नहीं कर पा रहा है।
दादी ने मां-बेटियों को निकाला, नानी पाल रही
एचआईवी पॉजीटिव को लेकर आलम आज भी यह है कि इसे घृणा से देखा जा रहा है। एक महिला के पति की एचआईवी-एड्स से मौत हो गई। पत्नी और दोनों बेटियों को भी एचआईवी था। दादी ने तीनों को घर से निकाल दिया। महिला मां के घर आई और उसकी मौत हो गई। अब दोनों नातिनों को नानी पाल रही है। नानी की उम्र 70 वर्ष के करीब हो गई है। वह कहती है कि मेरे परिवार में भी अब कोई नहीं है। इन बेटियों की उम्र 12-13 साल हो गई है। इनका मेरे बाद क्या होगा यह चिंता सताए जा रही है। सरकार इनको एक हजार रुपए पालने के तो दे रही है लेकिन पालेगा कौन?

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चार मौतें एक साल में एक ही घर में
एक परिवार पर तो एचआईवी कहर बनकर टूटा है। परिवार के तीन जवान 35 से 40 की उम्र में एक-एक कर खत्म हो गए। चौथी मौत एक महिला की हुई। एक साल के अंतराल में चार मौतें हुई तो गांव में तो यही समझा कि इस परिवार पर कोई तंत्र-मंत्र का साया हो गया है। इस दौरान बीएनपी प्लस की टीम यहां पहुंची और काउंसंलिंग की। युवकों की बीमारी के दौरान ली जा रही दवाइयां देखी तो माजरा समझ में गया। फिर परिवार से समझाइश की। एक मौत इसके तुरंत बाद भी हुई। परिवार में अब मां-बेटी एचआईवी के साथ जी रही है।

खुद को एचआईवी अब पीडि़तों की कर रहे मदद
यहां बीएनपी प्लस का संगठन चलाने वाले युवक को एक दशक से अधिक समय एचआईवी के साथ जीते हुए हो गया है। पहले पहल ग्लानि हुई लेकिन बाद में समझ लिया कि यह भी एक बीमारी है। इसके बाद उन लोगों के लिए जीना शुरू कर दिया जो एचआईवी से संघर्ष कर रहे हैं। अब एक हजार से अधिक लोगों का नेटवर्क चलाते है जो एचआईवी के साथ जीने वालों की मदद कर रहा है।

वर्ष एचआईवी- मौतें
2013-539-9

2014-717-36

2015-879-39

2016-1001-41

2017-1248-47

जिंदगी वहां से शुरू,जहां खत्म करना तय किया था
21 से 25 की उम्र में जब मस्ती और मौज का दौर सिर चढ़कर सवार था तब दो युवाओं और एक युवती को जीवन ने एेसा झटका दिया कि उन्होंने तय कर लिया कि अब एक दिन भी नहीं जीएंगे। शर्म और ग्लानि के साथ जीवन छोडऩा तय कर चुके इन तीनों ने फिर हिम्मत जुटाई और न केवल खुद को जिंदगी दी बल्कि तीन और जीवन बचा लिए।
ये तीन अलग-अलग युवा है। पहली एक युवती है। युवती तीन साल पहले ग्यारहवीं में पढ़ती थी तभी उसकी अचानक तबीयत खराब रहने लगी। इलाज करवाया तो सामने आया कि एचआईवी है। एचआईवी मतलब जीवन का अंत। शर्म के मारे उसके सामने एक ही रास्ता था कि अब नहीं जीना। परिवार के लिए भी एेसा ही। एक-एक पल जीना मुश्किल था और उस दौर में उसने हिम्मत जुटाई और कहा इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। मैं इसका मुकाबला करूंगी। फिर क्या था, उसने यह बात पहले उन लोगों तक पहुंचाई जहां उसकी सगाई हुई थी। इसके बाद परिवारजनों को कहा कि इलाज लूंगी और जीऊंगी। परिवार साथ हुआ तो आज वो द्वितीय वर्ष में है। वह कहती है कि जीना छोडऩा गलत है। जीवन में यही संदेश है।

मां के लिए जी लिया....

दूसरे दो युवक है। इन युवकों के भी एचआईवी हो गया। एक मजदूरी करता था। यहां बीमार रहने लगा। पता चला कि एचआईवी है। मजदूरी से हटा दिया गया और गांव आ गया। निराशा घोर थी और घर वालों ने भी खूब सुनाया, लेकिन मां के पास जाकर बोला-मां क्या करूं? मां तो मां है, आंसू पौंछते हुए बोली- बेटा छोड़कर मत जाना..तुझे मेरी कसम। बस उसी पल तय किया कि अब इसके साथ जी लूंगा। इसकी भी सगाई हो गई थी। खुद ही जाकर सामना किया और बोला मेरे एचआईवी है। किसी एचआईवी के साथ जीने वाली से शादी करूंगा। उस दिन से गुजरात में खुद का काम शुरू किया और उपचार ले रहा है। अब वह मां से वादा करने लगा है कि दुल्हन लानी है। उसने कहा-मेरी मां ने कहा तो जी लिया...वरना जा रहा था।

पॉजीटिव के साथ जिंदगी पॉजीटिव

शहर में एक व्यक्ति को करीब 30 साल से एचआईवी है। पॉजीटिव होने के बाद उसने एक बार तो यह सोच लिया कि जिंदगी खत्म है। मुम्बई से कई महीनों तक घर नहीं आया। घर से पत्र आने लगे तो उसको पढ़कर लगा कि उसका इंतजार तो पूरा परिवार कर रहा है। वह यहां लौटा और सारी बात बताई। परिवार ने कहा जो हुआ सो हुआ...अब इलाज करवाइए। वो कहता है कि भले ही परिवार ने मुझे माफ किया लेकिन मैने अपने आप में तय किया कि अब इसके लिए ही जीऊंगा ओर तब से लोगों के पास पहुंचकर एचआईवी बचाव की जानकारी दे रहा हूं।

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Published on:
01 Dec 2017 12:07 pm
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