
जमवारामगढ़ (जयपुर)। उपखंड मुख्यालय से सटी वन्यजीव अभयारण्य की पहाड़ी की तलहटी में मां शक्ति दांत माता का प्रसिद्ध मंदिर का इतिहास सत्रह सौ वर्ष पुराना है। मंदिर पुजारी रामजीलाल शर्मा बताते है कि प्राचीन मांच नगर के पास पहाड़ी की तलहटी में दांत माता स्वर्ण रथ में सवार होकर जाते समय ग्वालों ने देख लिया था।
ग्वालों के मातेश्वरी को देखते ही दांत माता पहाड़ी की तलहटी में रथ सहित विराजमान हो गई। मातेश्वरी ने ग्वालों को आशीर्वाद दिया कि सच्चे मन से पूजा अर्चना करने पर सुख समृद्धि में कोई कमी नहीं रहेगी। दांत माता पूरे जमवारामगढ़ कस्बा प्राचीन मांच नगर के निवासियों की आराध्य कुलदेवी है।
दांत माता मंदिर के नीचे आधे रास्ते में विश्राम स्थल पर मीणा शासक राव मेदा की घोडे पर सवारी वाली मूर्ति लगी हुई है। दो बड़ी धर्मशालाएं बनी हुई है। जहां श्रद्धालुओं के रात्रि विश्राम एवं सवामणियां करने के लिए व्यवस्था है।
नवरात्र के समय माता जी के दर्शन एवं भोग लगाने के लिए प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते जाते है। चैत्र नवरात्र अष्टमी को माताजी का मेला लगता है। जो आसपास में दांत माता के मेला का नाम से प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं को माता जी के मंदिर तक आने जाने के लिए मंदिर विकास समिति ने श्रद्धालुओं के सहयोग से सीढ़ियों के रास्ते पर टीनशेड लगवाए है।
शारदीय नवरात्र में प्रतिदिन पदयात्राएं आती है। जिससे मंदिर माता के जयकारों से गुंजायमान रहता है। मंदिर में दिल्ली, हरियाणा, जयपुर, अलवर, दौसा, करौली, भरतपुर, धौलपुर, टोंक, सवाईमाधोपुर, कोटा सहित कई जिलो के श्रद्धालु आते है।
मन्दिर के जीर्णोद्धार की दरकार
दांत माता का प्राचीन मंदिर है। जिसकी कई बार मरम्मत श्रद्धालुओं ने करवाई है। लेकिन जन आस्था की प्रतीक मातेश्वरी दांत माता के मंदिर का जीर्णोद्धार समय की जरूरत है। मां जगदम्बा दांत माता विकास समिति से जुड़े श्रद्धालुओं ने मंदिर के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाने की अपील की है।