
Rural Mental Health: मानसिक स्वास्थ्य की समस्या अब केवल शहरों तक सीमित नहीं है बल्कि बेमेतरा जिले के ग्रामीण अंचलों में भी इसके मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विभाग अब ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रहा है ताकि रोगियों की समय पर पहचान कर उनका समुचित उपचार शुरू किया जा सके। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की तिमाही रिपोर्ट के अनुसार जिले में 2,00,549 के वार्षिक/तिमाही लक्ष्य के मुकाबले केवल 70,928 (35%) उपलब्धि हासिल हुई है। इस आंकड़े का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बड़े अस्पतालों की तुलना में ग्रामीण इलाकों के उप स्वास्थ्य केंद्रो में रोगियों की पहचान का काम अधिक सजगता से हो रहा है।
समीक्षा आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण स्तर पर कार्यरत उप स्वास्थ्य केंद्रों में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने काफी सराहनीय कार्य किया है। जमीनी अमले ने 1,55,247 के निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले 63,458 उपलब्धियां (41 प्रतिशत) दर्ज की हैं। इसके विपरीत जहां मरीजों को मुख्य और विशेषज्ञ उपचार मिलना चाहिए, उन सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का प्रदर्शन कमजोर रहा। सीएचसी व जिला अस्पताल स्तर पर 25,599 के लक्ष्य के विरुद्ध मात्र 22 प्रतिशत (5,583 मरीज) और पीएचसी स्तर पर 19,703 के लक्ष्य पर केवल 1,887 मरीजों की जांच हो पाई है।
बेमेतरा जिले में ब्लॉक वार स्थिति देखें तो बेरला ब्लॉक के ग्रामीण क्षेत्र सबसे आगे रहे, जहां उप स्वास्थ्य केंद्र स्तर पर 79 प्रतिशत (26,702 मरीज) कार्य पूरा हुआ और बेरला का कुल ब्लॉक स्कोर 70 प्रतिशत तक पहुंच गया। दूसरी ओर बेमेतरा सीएचसी में 3,309 के लक्ष्य पर मात्र 16 मरीज (0.5%) और साजा पीएचसी में 8,192 के लक्ष्य पर केवल 66 मरीज (0.8%) ही दर्ज हो सके। वर्तमान में नवागढ़ (29%), साजा (27%) और बेमेतरा ब्लॉक (27%) की कुल प्रगति काफी पिछड़ी हुई है। हालांकि, जिले के विभिन्न केंद्रों की मासिक ओपीडी में हर महीने औसतन 700 से 900 के आसपास मानसिक रोगी परामर्श और उपचार के लिए पहुंच रहे हैं।
जानकार मानते है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक रोगियों की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि के पीछे मुख्य रूप से चार बड़े कारण सामने आए हैं, पारिवारिक तनाव, आर्थिक समस्याएं, आपसी रिश्तों में खटास और नशा। इनमें से नशा मानसिक बीमारी का सबसे बड़ा और खतरनाक कारण बनकर उभरा है। स्वास्थ्य आंकड़ों के मुताबिक, हर महीने ओपीडी में आने वाले कद्दल मरीजों में औसतन 15 से 18 मरीज ऐसे होते हैं, जो अत्यधिक शराब या अन्य नशीले पदार्थों के सेवन के कारण गंभीर मानसिक विकृतियों और अवसाद का शिकार हो चुके हैं। नशे की लत न केवल व्यक्ति के दिमाग को खोखला कर रही है, बल्कि परिवारों को भी तबाह कर रही है।
मनोवैज्ञानिक डॉ. नरेन्द्र कुमार वर्मा बताते हैं कि समझना होगा कि आत्महत्या किसी भी समस्या या परेशानी का हल नहीं है। मानसिक बीमारी भी शारीरिक बीमारियों की तरह ही एक चिकित्सीय विकार है, जिसे सही समय पर इलाज और देखभाल से पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। जब भी कोई व्यक्ति अत्यधिक तनाव या अवसाद महसूस करे, तो आत्मघाती कदम उठाने के बजाय सीधे मनोचिकित्सक या योग्य डॉक्टर के पास जाकर परामर्श लेना चाहिए। यदि उप स्वास्थ्य केंद्रों की तरह ही प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी तत्परता लाई जाए तो मरीजों को समय पर सही दवाएं मिल सकेंगी। सजगता, अपनों के संवाद और उचित उपचार से हर अनमोल जिंदगी को बचाया जा सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी और समय पर उपचार न मिलने का सबसे भयावह परिणाम आत्महत्या के रूप में सामने आ रहा है। जिले में पिछले तीन वर्षों के आंकड़े इस गंभीर मानवीय संकट की ओर इशारा करते हैं। जिले में वर्ष 2024 में कुल 156 लोगों ने आत्महत्या की थी, जबकि वर्ष 2025 में यह आंकड़ा बढक़र 185 तक पहुंच गया। वहीं चालू वर्ष 2026 में केवल जून माह तक ही 105 लोग अपनी जीवन लीला समाप्त कर चुके हैं। ढाई साल के भीतर 446 लोगों द्वारा उठाया गया यह आत्मघाती कदम यह साबित करता है कि समाज में छुपा हुआ मानसिक तनाव किस कदर जानलेवा रूप ले चुका है।