
Congress: कांग्रेस पार्टी के भीतर एक बार फिर आपसी मतभेदों की दीवार खड़ी हो गई है। ईरान युद्ध और देश में एलपीजी गैस की सप्लाई जैसे गंभीर मुद्दों पर पार्टी के दिग्गज नेताओं की राय एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। जहां राहुल गांधी सरकार के फैसलों पर हमलावर हैं, वहीं कमलनाथ, शशि थरूर और आनंद शर्मा जैसे वरिष्ठ नेताओं ने केंद्र सरकार के रुख को सही ठहराया है। इससे पार्टी के अंदर विचारों में स्पष्ट विभाजन दिख रहा है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मुद्दों पर राजनीतिक एकजुटता की अपेक्षा की जा रही थी।
राहुल गांधी ने मोदी सरकार की विदेश नीति पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने मांग की थी कि भारत को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या की कड़ी निंदा करनी चाहिए। इसके विपरीत शशि थरूर ने सरकार के रुख को जिम्मेदार कूटनीति बताया। मनीष तिवारी ने भी एक टीवी चर्चा में कहा कि सरकार सही दिशा में काम कर रही है। आनंद शर्मा ने सरकार की कूटनीतिक रणनीति को परिपक्व और कुशल बताया और राष्ट्रीय एकता की अपील की। उन्होंने कहा कि ऐसे संवेदनशील समय में सभी दलों को एकजुट रहना चाहिए। सरकार ने इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक भी की, जिसमें विभिन्न नेताओं को स्थिति की जानकारी दी गई।
एलपीजी आपूर्ति को लेकर भी कांग्रेस के भीतर अलग-अलग राय सामने आई है। पार्टी नेतृत्व जहां गैस की कमी का मुद्दा उठा रहा है, वहीं कमलनाथ ने इस दावे को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि किसी प्रकार की कमी नहीं है और यह केवल माहौल बनाया जा रहा है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि अब कांग्रेस के अपने नेता ही मान रहे हैं कि देश में पेट्रोल, डीजल और गैस की कोई कमी नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस जनता में डर और भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है। भाजपा प्रवक्ता ने भी कांग्रेस के अंदरूनी मतभेद को लेकर राहुल गांधी पर निशाना साधा।
यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस में इस तरह के मतभेद सामने आए हैं। इससे पहले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पार्टी के भीतर अलग-अलग राय दिखी थी। उस समय भी शशि थरूर और मनीष तिवारी ने सरकार की कार्रवाई का समर्थन किया था, जबकि राहुल गांधी ने सवाल उठाए थे। बाद में संसद में चर्चा के दौरान दोनों नेताओं को बोलने का अवसर नहीं दिया गया था। मौजूदा घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि विदेश नीति और राष्ट्रीय मुद्दों पर कांग्रेस के भीतर एकमत नहीं है। वरिष्ठ नेताओं के अलग रुख से पार्टी की रणनीति और नेतृत्व पर सवाल खड़े हो रहे हैं।