
Ravi Pushya Yoga : संतान की सुख-समृद्धि और लंबी उम्र की कामना लेकर माताएं अहोई अष्टमी का व्रत करती हैं। 1 नवंबर को किए जाने वाले पूजन में महिलाएं तारों को अर्घ्य देकर निर्जला व्रत खोलेंगी। इस साल अहोई अष्टमी के साथ ही रवि पुष्य योग का शुभ संयोग भी आएगा। यानी जहां एक ओर माताएं संतान की लंबी उम्र के लिए व्रत रखेंगी, वहीं दूसरी और बाजारों में भी खरीदारी को लेकर रौनक रहेगी। रवि पुष्य योग का अष्टमी के साथ सप्तमी तिथि का संयोग भी बन रहा है। इसे आर्थिक समृद्धि के साथ यशकारक भी कहा जाता है।
दीवार पर चित्र बनाकर पूजा करने की परंपरा
अहोई अष्टमी पर माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के साथ निर्जला व्रत रखेंगी। करवा चौथ के चार दिन बाद आने वाले इस पर्व पर महिलाएं सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेंगी। शाम को अहोई माता की पूजा कर कथा सुनेंगी। इसके बाद तारों के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य देंगी और व्रत खोलेंगी। कई घरों में संतान की सुख-समृद्धि के लिए अहोई माता की तस्वीर या दीवार पर उनका चित्र बनाकर पूजा करने की परंपरा है।
पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2.50 बजे शुरू होकर 2 नवंबर को दोपहर 1.11 बजे तक रहेगी। शाम को तारों की पूजा का शुुभ मुहूर्त 5.34 बजे से 6.52 बजे तक रहेगा। तारों के दर्शन का समय शाम 6 बजे से माना गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुष्य नक्षत्र को 27 नक्षत्रों में सबसे शुभ नक्षत्रों में गिना जाता है। जब रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र का संयोग बनता है तो इसे रवि पुष्य योग कहा जाता है। ज्योतिषीय मान्यता है कि इस योग में खरीदी गई वस्तुएं लंबे समय तक सुख-समृद्धि का प्रतीक बनी रहती हैं। इस बार अहोई अष्टमी के साथ यह संयोग बनने से पर्व का महत्व और बढ़ गया है।
ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद गौतम के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि और रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र का संयोग विशेष फलदायी माना जाता है। रविवार और सप्तमी दोनों के अधिष्ठाता भगवान सूर्यदेव हैं। ऐसे में रवि पुष्य योग के साथ इस तिथि का संयोग तेज, यश और आर्थिक समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।
रविवार के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद गौतम बताते हैं कि इसे शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए बहुत अनुकूल माना गया है।