
Bharatpur : भरतपुर. 11 नवंबर 2007 की वो सुबह जब अचानक एक संत ने डीग जिले के कामवन में एसडीएम कार्यालय पर 22 हजार ब्रजयात्रियों के साथ महापड़ाव को कूच किया तो स्थानीय, जिला प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तक हिल गई। 24 घंटे तक अन्न जल का त्याग कर ब्रजयात्रियों ने कामां व डीग के बृज चौरासी कोस परिक्रमा मार्ग के पर्वतों को खनन मुक्त करने की मांग रखी तो आनन-फानन में खुद पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को दखल देना पड़ा। केंद्र सरकार ने भी 20 दिन के अंदर वन संरक्षित घोषित करने की प्रक्रिया पूरी कर दी। इस आंदोलन के बाद ब्रज का लगभग 5,253 हेक्टेयर पहाड़ी क्षेत्र आरक्षित वन क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया।
19 वर्ष तक ब्रज के पर्वतों के संरक्षण की लड़ाई लड़ने वाले ब्रज के विरक्त संत पद्मश्री रमेश बाबा का मंगलवार को निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे और काफी समय से बीमार थे। उन्होंने उत्तरप्रदेश के बरसाना के मान मंदिर में अंतिम सांस ली। रमेश बाबा ने अपना पूरा जीवन गौ और पर्यावरण सेवा में लगाया। रमेश बाबा का जन्म 1938 में प्रयागराज में हुआ था। 1954 में वह 16 वर्ष की आयु में बरसाना आ गए। यहां वह राधारानी मंदिर में मृदंग बजाते थे। इस दौरान उन्होंने बरसाने में ही ब्रह्मांचल पर्वत पर मान मंदिर आश्रम बनाया और ठाकुर मान बिहारी की सेवा की। रमेश बाबा ने पर्यावरण संरक्षण के लिए गहवरवन में काटे जा रहे पेड़ों के विरोध में अभियान चलाया। उन्होंने यहां बरसाना से लेकर राजस्थान के पहाड़ों पर हो रहे अवैध खनन के विरुद्ध आंदोलन किया। उनकी पहल ही थी कि वर्ष 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने ब्रज की पहाड़ियों पर खनन बंद करने का आदेश दिया।
वर्ष 2007 में रमेश बाबा ने दो गोवंशों के साथ श्रीमाताजी गौशाला का संचालन किया। माताजी गोशाला एशिया की सबसे बड़ी गोशाला बन गई और 65 हजार गायों का यहां संरक्षण हो रहा है। यह देश की ऐसी पहली गौशाला है, जहां 65 हजार गाय एक ही जगह रहती हैं। उनके गौ-सेवा और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों को देख उन्हें 2019 में पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया गया। वर्ष 1968 में रमेश बाबा ने ब्रजवासियों के साथ ब्रज चौरासी कोस की राधारानी ब्रजयात्रा निकाली। इसमें प्रतिवर्ष 20-22 हजार श्रद्धालु निशुल्क ब्रजयात्रा करते हैं। इनके रहने और खाने की व्यवस्था मान मंदिर आश्रम की ओर से की जाती है।
संत रमेश बाबा ने संंकल्प लिया था कि किसी भी कीमत पर वह बृज से बाहर नहीं जाएंगे। बृज से बाहर आंदोलन, कार्यक्रम होने पर उनके प्रतिनिधि ही शामिल होते थे। वह कभी बृज क्षेत्र से बाहर नहीं जाते थे। बाबा ने प्रयाग में ही विद्या ग्रहण की। उनके अंदर की आध्यात्मिक ज्योति उन्हें गृह त्याग कर ब्रज आने के लिए हमेशा प्रेरित करती रही। बाबा ने दो बार जन्मभूमि छोड़कर ब्रजभूमि आने की कोशिश की पर मां का बंधन उन्हें रोके रहा। तीसरी बार किसी तरह वे सब बंधनों को तोड़कर ब्रजभूमि आने में सफल हो ही गए। उन्होंने कामां व डीग के दर्जनों कुंडों का जीर्णोद्वार कराया।