
Jabalpur news: डीजे का कानफोडू शोर और उसकी बेचैनी पैदा करने वाली धमक गर्भवती महिलाओं और उनके गर्भस्थ शिशुओं के स्वास्थ्य पर गंभीर संकट खड़ी कर रही है। गर्भाशय की दीवारें और एम्नियोटिक द्रव बाहरी शोर को कुछ हद तक रोकते हैं, लेकिन 85-90 डेसिबल से ज्यादा का शोर इस सुरक्षा चक्र को भेद देता है। गर्भावस्था के तीसरे हफ्ते से सातवें माह के बीच शिशु के कान विकसित होते हैं। ऐसे में शोर से शिशु के कोक्लिया को नुकसान पहुंच सकता है। सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
स्त्री रोग विशेषज्ञों और हृदय रोग विशेषज्ञों के पास ऐसे मामले आ रहे हैं जहां डीजे के शोर के कारण गर्भवतियों का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। घबराहट या सीने में दर्द की शिकायत होने लगती है। कई बार स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि महिलाओं को इमरजेंसी में अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। डॉक्टरों के अनुसार महिलाओं में कॉर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर बढ़ने से भ्रूण में तनाव पैदा होता है। इससे समय से पहले प्रसव और शिशु का वजन कम होने का खतरा बढ़ जाता है।
मानेगांव की 32 वर्षीय महिला को रूटीन जांच के दौरान रास्ते में डीजे के शोर से अचानक घबराहट हुई। अस्पताल पहुंचने पर उसका बीपी बढ़ा हुआ मिला। इसी तरह अधारताल की एक अन्य महिला को घर के पास बज रहे डीजे के कारण सीने में दर्द और बेचैनी की समस्या हुई। उसे हृदय रोग विशेषज्ञ के पास ले जाना पड़ा।
-85-90 डेसिबल से ज्यादा का शोर गर्भस्थ शिशु के विकसित हो रहे कानों को नुकसान पहुंचा सकता है।
-गर्भवतियों में हाई ब्लड प्रेशर, सीने में दर्द, घबराहट और बेचैनी के मामले बढ़ रहे हैं।
-तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन बढ़ने से प्री-मैच्योर डिलीवरी, शिशु का वजन कम होने का खतरा।
विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य बातचीत (60 डेसिबल) से कोई समस्या नहीं होती, पर 120 डेसिबल के शोर से गर्भवती का नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है। हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आरएस शर्मा और गॉयनेकोलॉजिस्ट डॉ. नीता पाराशर का मानना है कि शोर के लगातार संपर्क में रहने से महिलाओं में धड़कन बढ़ने, बीपी गड़बड़ होने, शिशु की ग्रोथ रुकने, वजन घटने जैसी परेशानियां सामने आ रही हैं।