
Biplab Deb Madhya Pradesh BJP: त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री और पश्चिम त्रिपुरा से सांसद बिप्लब देब को बीजेपी ने हाल ही में बड़ी जिम्मेदारी देते हुए मध्यप्रदेश बीजेपी का नया प्रभारी बनाया है। वैसे तो मध्यप्रदेश बीजेपी का मजबूत गढ़ रहा है, लेकिन बीते कुछ समय में मध्यप्रदेश बीजेपी में बीते कुछ समय में ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिनसे संगठन की स्थिति को लेकर सवाल उठे हैं। हेमंत खंडेलवाल के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद दतिया उपचुनाव में मिली हार के बाद तो संगठन की चिंता और बढ़ी नजर आ रही है। ऐसे में नए प्रभारी बिप्लब देब की राह मध्यप्रदेश में आसान नजर नहीं आ रही है, उनके सामने मध्यप्रदेश में कौन सी प्रमुख चुनौतियां हैं पढ़िए पूरा विश्लेषण।
मध्यप्रदेश में बिप्लब देब के सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती बड़े दिग्गज नेताओं, संगठन और सरकार के बीच समन्वय की है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मोहन यादव, कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह और नरोत्तम मिश्रा जैसे बड़े नेताओं के बीच बेहतर समन्वय और तालमेल स्थापित रखना बेहद जरुरी है, अगर किन्हीं भी नेताओं के बीच संवादहीनता की स्थिति बनती है, तो यह पार्टी संगठन के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। खासकर कैलाश विजयवर्गीय के द्वारा हाल में ऐसी बयानबाजी की गई है जो मीडिया में सुर्खियों में रही है।
मध्यप्रदेश के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का दतिया उपचुनाव में टिकट काटना और फिर उनके समर्थकों के द्वारा हंगामा, चक्काजाम करना और फिर चुनाव में भाजपा की ओर से एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बाद भी हार का मुंह देखना, कहीं न कहीं पार्टी के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में नए प्रभारी बिप्लब देब को नरोत्तम मिश्रा को साधे रखना और साथ लेकर चलना भी जरुरी रहेगा।
साल 2027 में मध्यप्रदेश में होने वाले नगरीय निकाय चुनावों के लिए बेहद कम वक्त बचा है, ऐसे में संगठन को मजबूत करना और नगरीय निकाय चुनावों में पार्टी का 'कमल' खिलाने की बड़ी चुनौती बिप्लब देब के सामने है। पिछले नगरीय निकाय चुनावों से बेहतर परिणाम हासिल करना बिप्लब देब के लिए पहली 'अग्निपरीक्षा' होगी।
नगरीय निकाय चुनावों के कुछ महीनों बाद ही साल 2028 में मध्यप्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं। बीजेपी वर्तमान में प्रदेश में सत्ता में है, ऐसे में 2028 के विधानसभा चुनावों में एक बार फिर बीजेपी ने अपने विजयी रथ को बरकरार रखना चाहेगी। यहां ये भी बता दें कि अगर साल 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद बनी कमलनाथ सरकार के एक 15 महीने के कार्यकाल को हटा दिया जाए तो मध्यप्रदेश में भाजपा बीते करीब 22 सालों से सत्ता में है। इसके साथ ही साल 2029 में होने वाले लोकसभा चुनावों में भी बिप्लब देब को खुद को साबित करना होगा, क्योंकि अभी प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है। जिसे बरकरार रखना किसी चुनौती से कम नहीं है।
बिप्लब देब को चुनौतियों से निपटना बखूबी आता है और शायद यही वजह है कि उन्हें पार्टी ने मध्यप्रदेश जैसे अहम राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है। साल 2018 के त्रिपुरा में विधानसभा चुनावों में बिप्लब के नेतृत्व में ही भाजपा ने जीत दर्ज की थी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के 25 वर्षों के शासन का अंत किया था। हरियाणा का प्रभारी बनाए जाने पर बिप्लब के नेतृत्व में हरियाणा में तीसरी बार भाजपा की जीत हुई। हाल ही में हुए बंगाल चुनाव में भी बिप्लब को करीब 49 सीटों की कठिन जिम्मेदारी सौंपी गई थी, इनमें से 26 सीटों पर भाजपा को जीत हासिल हुई।