
MP Congress - एमपी में राज्यसभा की सीट खोने का गम कांग्रेसियों को सालों तक सालता रहेगा। जिन 3 सीटों पर चुनाव होने थे उनमें से बीजेपी की 2 और कांग्रेस की 1 सीट थी। संख्या बल के लिहाज से दोनों दलों के आधिकारिक प्रत्याशियों की जीत तय थी। शुरु से ही कांग्रेस की सीट पर प्रदेश बीजेपी की नजर लगी थी और उसने बड़ा खेल खेला। तीसरी सीट के लिए अपना उम्मीदवार उतारकर क्रॉस-वोटिंग का शिगूफा छेड़ दिया। टूट-फूट की आशंका से ग्रस्त कांग्रेस नेता अपने विधायकों की बाड़ाबंदी में व्यस्त हो गए और इधर बीजेपी ने मीनाक्षी नटराजन Meenakshi Natarajan के कथित केस का जिक्र कर नामांकन पर आपत्ति लगाकर बाजी जीत ली। कांग्रेसी भले ही इसे चुनाव चोरी के बाद सीट चोरी का मामला बता रहे हैं पर पूरे घटनाक्रम में खुद भी घिरे हैं। प्रदेश के 7 प्रमुख नेताओं की भूमिका सवालों के घेरे में है। कुछ नेताओं के प्रति तो राष्ट्रीय नेतृत्व साफतौर पर नाराजगी भी जता चुका है। राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाई गईं मीनाक्षी नटराजन से भी चूक हुई जिससे खुद उनके साथ कांग्रेस का भी बड़ा नुकसान हुआ। हाईकमान इस घटना से विचलित है।
मध्यप्रदेश से राज्यसभा के लिए उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद कांग्रेस ने सोमवार को प्रदेशभर में भाजपा और निर्वाचन आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। युवा कांग्रेस कार्यकर्ता सभी जिलों में निर्वाचन आयोग के खिलाफ प्रदर्शन के साथ ही जिला भाजपा कार्यालयों का घेराव भी कर रहे हैं। इसी के साथ कांग्रेस के 3 दिवसीय प्रदेशव्यापी अभियान की शुरुआत हो गई है।
इस बीच मीनाक्षी नटराजन मामले में पार्टी में अंदरूनी मंथन भी चल रहा है। प्रकरण से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बेहद खफा हैं। मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी की घोषणा से लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने तक की अवधि में प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं की एक-एक हरकत का विश्लेषण किया जा रहा है। राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष एमपी के 7 नेता सवालों के घेरे में हैं-
राज्यसभा के लिए मीनाक्षी नटराजन का नाम घोषित होते ही उनके समर्थक खुलेआम विरोध पर उतर आए। हाईकमान के निर्णय पर सवाल उठाए। जब पूरी पार्टी नामांकन निरस्त होने के मुद्दे को उठा रही थी तब दिग्विजय के एक समर्थक ने उन्हें सीएम बनाने की मांग कर डाली।
पूर्व सीएम व सबसे वरिष्ठ विधायक होने के बावजूद मीनाक्षी नटराजन के प्रति समर्थन व्यक्त करने के लिए बुलाई गई बैठक कांग्रेस विधायक दल की बैठक में नहीं आए। हालांकि वर्चुअली समर्थन जताया। उनके एक समर्थक विधायक, एयरपोर्ट पर घंटों बैठाए रखने पर अपनी ही पार्टी पर बरस पड़े।
प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते अतिरिक्त जिम्मेदारी थी पर इसका निर्वहन नहीं कर सके। बीजेपी की चालबाजी को वे भांप ही नहीं सके।
मीनाक्षी नटराजन, खुद राहुल गांधी की उम्मीदवार थीं। पीसीसी चीफ के साथ ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उमंग सिंघार पर भी इसकी पूरी जवाबदारी थी। आलाकमान की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।
प्रदेश प्रभारी के रूप में वरिष्ठ नेताओं से समन्वय का अभाव साफ नजर आया। नामांकन निरस्त कर दिए जाने की रात कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेस में दिग्विजय सिंह से खुलेआम कह दिया कि अब आप रहने दीजिए, हम कर लेंगे। बाद में कथित तौर पर माफी मांगी पर नुकसान हो चुका था।
प्रदेश के केवल वरिष्ठ नेता और अधिवक्ता ही नहीं बल्कि चुनाव मामलों के प्रभारी भी हैं। ढाई दशक के अनुभव के बावजूद चूक कर बैठे।
खास बात यह है कि राष्ट्रीय नेतृत्व मीनाक्षी नटराजन की भूमिका से भी संतुष्ट नहीं है। 4 दिन पहले उम्मीदवारी घोषित कर दिए जाने के बाद भी वे आवश्यक सतर्कता नहीं बरत सकीं।