High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट करते हुए कहा है कि यदि गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम, 1967 (यूएपीए) के तहत जांच अवधि विस्तार की अनुमति प्रारंभिक 90 दिनों की समाप्ति से पहले दे दी जाती है, तो इसे वैधानिक समय का वैध विस्तार माना जाएगा।
Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट करते हुए कहा है कि यदि गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम, 1967 (यूएपीए) के तहत जांच अवधि विस्तार की अनुमति प्रारंभिक 90 दिनों की समाप्ति से पहले दे दी जाती है, तो इसे वैधानिक समय का वैध विस्तार माना जाएगा। ऐसी स्थिति में, आरोपी 90 दिन पूरे होने पर सीआरपीसी की धारा 167(2) (अब बीएनएसएस की धारा 187(2)) के तहत डिफॉल्ट बेल के अधिकार का दावा नहीं कर सकता।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने रमेश मंडावी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। अपील में विशेष न्यायाधीश (एनआईए एक्ट), उत्तर बस्तर, कांकेर के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनके माध्यम से जांच की अवधि बढ़ाई गई थी और बाद में डिफॉल्ट बेल की अर्जी खारिज कर दी गई थी। अपीलकर्ता रमेश मंडावी, जो कांकेर जिले की ग्राम पंचायत अर्रा के पूर्व सरपंच रह चुके हैं, को 16 जुलाई, 2025 को थाना अंतागढ़ में एफआईआर दर्ज होने पर गिरफ्तार किया गया था। उन पर आईपीसी की विभिन्न धाराओं, आर्म्स एक्ट और यूएपीए की धाराओं के तहत प्रतिबंधित नक्सली संगठनों के साथ संलिप्तता का आरोप लगाया गया था।
जांच पूरी करने की प्रारंभिक 90 दिनों की वैधानिक अवधि 14 अक्टूबर, 2025 को समाप्त हो रही थी। हालांकि, 7 अक्टूबर, 2025 को ही विशेष न्यायाधीश ने जांच अधिकारी के आवेदन को स्वीकार करते हुए जांच का समय 180 दिनों तक बढ़ा दिया। 14 अक्टूबर बीत जाने पर अपीलकर्ता ने डिफॉल्ट बेल के लिए आवेदन किया, जिसे 17 अक्टूबर, 2025 को अदालत ने खारिज कर दिया।
राज्य की ओर से उप सरकारी अधिवक्ता सौम्य राय ने दलील दी कि विस्तार का आवेदन एक विस्तृत प्रगति रिपोर्ट के आधार पर दिया गया था। इसमें फरार सह-आरोपियों की गिरफ्तारी, जारी तलाशी अभियान और यूएपीए की धारा 45 के तहत आवश्यक वैधानिक मंजूरी लंबित होने का उल्लेख था। उन्होंने स्पष्ट किया कि 7 अक्टूबर की कार्यवाही के दौरान अपीलकर्ता के वकील मौजूद थे और उन्होंने उस समय कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी। कोर्ट ने निर्णय दिया कि चूंकि जांच की अवधि 90 दिन बीतने से पहले ही वैध रूप से 180 दिनों तक बढ़ा दी गई थी, इसलिए 14 अक्टूबर, 2025 को अपीलकर्ता के पक्ष में डिफॉल्ट बेल का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ था।