
Compassionate Appointment: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति मिलने के बाद कोई कर्मचारी अपनी पसंद का विशेष या उससे ऊंचा पद पाने का अधिकार नहीं जता सकता। यदि किसी व्यक्ति को किसी पद पर नियुक्ति दी गई है और उसने उसे स्वीकार कर कार्यभार भी संभाल लिया है, तो बाद में उसी आधार पर दूसरे या उच्च पद की मांग नहीं की जा सकती।
यह मामला रायपुर जिले के बीरगांव नगर निगम से जुड़ा है। यहां पिता की मृत्यु के बाद एक युवक को अनुकंपा के आधार पर चपरासी के पद पर नौकरी मिली थी। युवक ने नियुक्ति स्वीकार कर काम भी शुरू कर दिया, लेकिन बाद में अपनी शैक्षणिक योग्यता का हवाला देते हुए सहायक ग्रेड-3 के पद पर नियुक्ति देने की मांग की। इस मांग को लेकर उसने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी।
मामले के अनुसार, रायपुर जिले के हिरानगर, अछोली-उरला निवासी महेंद्र आदिल के पिता राजेंद्र आदिल नगर निगम बीरगांव में राजस्व निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे। 24 जुलाई 2025 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया था। पिता की मृत्यु के बाद परिवार को आर्थिक सहायता देने के उद्देश्य से महेंद्र ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया।
इस आवेदन पर कार्रवाई करते हुए नगर निगम ने 5 मई 2026 को महेंद्र को चपरासी के पद पर नियुक्ति दे दी। महेंद्र ने इस नियुक्ति को स्वीकार कर लिया और संबंधित पद पर कार्यभार भी ग्रहण कर लिया। हालांकि, बाद में उसने अपनी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर सहायक ग्रेड-3 के पद पर नियुक्ति देने की मांग शुरू कर दी।
महेंद्र की ओर से हाई कोर्ट में अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता की शैक्षणिक योग्यता चपरासी के पद से अधिक है। इसलिए उसे सहायक ग्रेड-3 के पद पर अनुकंपा नियुक्ति दी जानी चाहिए थी। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी बताया गया कि नगर निगम में सहायक ग्रेड-3 के आठ स्वीकृत पद हैं। अनुकंपा नियुक्ति नीति के तहत इस पद पर कुल स्वीकृत पदों की संख्या के 10 प्रतिशत तक नियुक्ति दी जा सकती है।
आठ पदों का 10 प्रतिशत 0.8 होता है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने अपने आवेदन पर विचार करने की मांग की थी। मामले में यह भी बताया गया कि नगर निगम आयुक्त ने सहायक ग्रेड-3 के पद की उपलब्धता को लेकर संयुक्त संचालक से मार्गदर्शन मांगा था। इसके बावजूद युवक को चपरासी के पद पर नियुक्ति दी गई थी।
राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता कार्यालय के लॉ अफसर ने याचिका का विरोध किया। सरकार की ओर से कहा गया कि राज्य की अनुकंपा नियुक्ति नीति में इस संबंध में स्पष्ट प्रावधान मौजूद है। नीति के खंड 20(1) के अनुसार, यदि किसी आवेदक को एक बार अनुकंपा नियुक्ति मिल जाती है, तो इसके बाद वह किसी दूसरे पद पर नियुक्ति देने या पहले से दिए गए पद में बदलाव करने की मांग नहीं कर सकता।
सरकार ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले आईजी (कार्मिक) विरुद्ध प्रह्लाद मणि त्रिपाठी का भी उल्लेख किया। सरकार का कहना था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से राहत देना है। इसे अपनी पसंद का पद या उच्च पद हासिल करने का अधिकार नहीं माना जा सकता।
मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस बीडी गुरु की एकल पीठ में हुई। कोर्ट ने पाया कि महेंद्र आदिल को नगर निगम बीरगांव में चपरासी के पद पर नियुक्ति दी गई थी। उसने इस नियुक्ति को स्वीकार भी कर लिया था और कार्यभार ग्रहण कर लिया था। ऐसी स्थिति में अनुकंपा नियुक्ति नीति के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार अब पद बदलने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति के तहत किसी व्यक्ति को अपनी पसंद का विशेष पद पाने का अधिकार नहीं है। नियुक्ति देते समय संबंधित पद की पात्रता, उपलब्ध रिक्तियों और नीति के अन्य प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए सक्षम प्राधिकारी निर्णय लेता है। केवल अधिक शैक्षणिक योग्यता होने के आधार पर कर्मचारी अपनी पसंद के उच्च पद पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति कम पद पर दी गई अनुकंपा नियुक्ति को स्वीकार कर कार्यभार ग्रहण कर लेता है, तो बाद में उसी नियुक्ति के आधार पर उच्च पद का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने इसी आधार पर सहायक ग्रेड-3 के पद पर नियुक्ति देने की मांग को स्वीकार नहीं किया।
जस्टिस बीडी गुरु की एकल पीठ ने 4 नवंबर 2026 को प्रारंभिक सुनवाई में ही महेंद्र आदिल की याचिका खारिज कर दी। इस फैसले से अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में यह बात फिर स्पष्ट हुई है कि नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देना है। इसके तहत नियुक्त व्यक्ति को अपनी पसंद का पद चुनने या नियुक्ति स्वीकार करने के बाद पद बदलवाने का स्वतः अधिकार नहीं मिलता।