
Fatwa Boycott: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फतवे और उसके कानूनी प्रभाव को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि फतवे में किसी व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार करने या उसके कानूनी अधिकारों को खत्म करने की कोई शक्ति नहीं है। फतवे का कोई बाध्यकारी कानूनी प्रभाव नहीं होता और इसे किसी व्यक्ति के अधिकारों को नुकसान पहुंचाने के लिए लागू नहीं किया जा सकता। यह मामला एक महिला के शिया मुस्लिम युवक से विवाह के बाद कथित तौर पर जारी किए गए फतवे से जुड़ा है।
आरोप था कि स्थानीय जामा मस्जिद प्रबंधन समिति ने विवाह के छह दिन बाद फतवा जारी कर महिला के परिवार को मुसलमान मानने से इनकार कर दिया था। साथ ही परिवार के सामाजिक बहिष्कार का भी आरोप लगाया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता भाई-बहन कथित सामाजिक बहिष्कार या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सके। इसके बाद अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी। यह आदेश 3 नवंबर को न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने दिया।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में फतवे की कोई कानूनी स्थिति नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि फतवा किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि फतवे का कोई बाध्यकारी कानूनी बल नहीं है। इसे इस तरह लागू नहीं किया जा सकता, जिससे किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों को नुकसान पहुंचे। इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक या सामाजिक स्तर पर जारी किसी फतवे को कानूनी आदेश की तरह लागू नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति के अधिकारों पर इसका अपने आप कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता।
यह पूरा मामला दो मुस्लिम संप्रदायों से जुड़े परिवारों के बीच विवाह के बाद शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता भाई-बहन सुन्नी समुदाय से संबंध रखते हैं। उनकी याचिका के अनुसार, भाई की बहन की बेटी ने एक शिया मुस्लिम युवक से शादी की थी। आरोप लगाया गया कि विवाह के छह दिन बाद यानी 23 अगस्त 2019 को स्थानीय जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के सदस्यों ने एक फतवा जारी किया। इसमें कथित तौर पर याचिकाकर्ताओं और उनके परिवार के सदस्यों को मुसलमान नहीं मानने की बात कही गई थी। साथ ही परिवार के सामाजिक बहिष्कार का भी आरोप लगाया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस कथित फतवे के कारण उन्हें समाज में अपमान और परेशानी का सामना करना पड़ा। उन्होंने इसे अपने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिकाकर्ता भाई ने आरोप लगाया था कि मस्जिद प्रबंधन समिति के सदस्यों ने व्यक्तिगत द्वेष के चलते यह कदम उठाया। उनका कहना था कि उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड में मस्जिद समिति के सदस्यों के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं और गबन की शिकायत की थी। याचिका के मुताबिक, शिकायत के बाद वक्फ बोर्ड ने समिति को भंग कर दिया था। इसके साथ ही एक प्रशासक नियुक्त किया गया और मामले की जांच शुरू की गई थी।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इसी कार्रवाई से नाराज होकर समिति के सदस्यों ने उन्हें परेशान और अपमानित करने के उद्देश्य से फतवा जारी किया। उन्होंने अदालत में कहा कि धार्मिक प्रथा के नाम पर किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और गरिमा को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मलय श्रीवास्तव ने अदालत में दलील दी कि 23 अगस्त 2019 को जारी कथित फतवे में विवाह समारोह में शामिल लोगों के विवाह को अमान्य घोषित किया गया था। उनका आरोप था कि संबंधित लोगों को अपने-अपने जीवनसाथी से दोबारा विवाह करने का निर्देश भी दिया गया था। अधिवक्ता ने दलील दी कि मस्जिद प्रबंधन समिति को किसी निजी और पारिवारिक मामले में हस्तक्षेप करने या किसी व्यक्ति की धार्मिक स्थिति तय करने का अधिकार नहीं है।
उन्होंने कथित फतवे को मनमाना और मुस्लिम पर्सनल लॉ के विपरीत बताते हुए कहा कि इससे याचिकाकर्ताओं की गरिमा और सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हुई। याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला देते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की थी।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की जांच रिपोर्ट पर भी गौर किया। पुलिस उपाधीक्षक की ओर से 15 जनवरी 2020 को पेश की गई रिपोर्ट में कहा गया था कि भाई-बहन के सामाजिक बहिष्कार का निर्देश देने वाला कोई फतवा जारी नहीं किया गया था। जांच रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया कि समाज में उनके खिलाफ कोई सामाजिक बहिष्कार प्रचलित नहीं था। अदालत ने इस रिपोर्ट और याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सामग्री का परीक्षण किया। हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि कथित फतवे को उनके खिलाफ लागू किया गया था या इसके कारण उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।
अदालत ने कहा कि केवल आरोप लगाने से याचिकाकर्ताओं को मांगी गई राहत नहीं दी जा सकती। इसके लिए ठोस सबूत होना जरूरी है। याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि कथित फतवे के कारण उनका सामाजिक बहिष्कार हुआ या उनके मौलिक अधिकारों का ऐसा उल्लंघन हुआ, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत हो।
केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता त्रिवेनी शंकर साहू ने भी दलील दी कि भारत सरकार की इस कथित फतवे को जारी करने या लागू करने में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। उन्होंने बताया कि शिकायत की जांच की गई थी और दंड प्रक्रिया संहिता के तहत आवश्यक कार्रवाई भी की गई, लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे संज्ञेय अपराध का पता चलता हो और एफआईआर दर्ज करने की जरूरत पड़े। सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ताओं को यह स्वतंत्रता दी कि वे चाहें तो कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपना सकते हैं।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने दो महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट की हैं। पहली, फतवे का अपने आप कोई बाध्यकारी कानूनी प्रभाव नहीं होता और इसके आधार पर किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता। दूसरी, अदालत से राहत पाने के लिए लगाए गए आरोपों को ठोस साक्ष्यों के साथ साबित करना जरूरी है। इस तरह अदालत ने फतवे की कानूनी स्थिति पर टिप्पणी करते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत देने से इनकार कर दिया।