
Bilaspur High Court: भारतीय सेना और पैरामिलिट्री फ़ोर्स के ख़िलाफ़ फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले सीआईएसएफ कांस्टेबल की विभागीय सजा को हाईकोर्ट ने उचित माना है।सैलरी में कटौती की सज़ा को सही ठहराते हुए कोर्ट ने कहा कि यह सज़ा दुर्व्यवहार के हिसाब से सही थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के आर्टिकल 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए, वह तब तक दखल नहीं दे सकता जब तक कि जांच में कोई प्रक्रियात्मक गड़बड़ी न हो या सज़ा बहुत ज़्यादा या अनुचित न हो।
कॉन्स्टेबल ने अनुशासनात्मक और अपीलीय अधिकारियों के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें एक साल के लिए सैलरी में स्टेज की कटौती (संचयी प्रभाव के साथ) की सज़ा दी गई। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उसका भारतीय सेना या पैरामिलिट्री फ़ोर्स का अपमान करने का कोई इरादा नहीं था और विभाग यह साबित करने के लिए ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहा कि आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट याचिकाकर्ता ने ही अपलोड किए। उसने यह भी तर्क दिया कि उसे अपनी बात रखने का उचित मौका नहीं दिया गया और सज़ा बहुत ज़्यादा थी।
विभाग ने कहा कि याचिकाकर्ता ने 23 और 24 जून 2020 को अपने फेसबुक अकाउंट पर पांच आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड किए थे, और तय प्रक्रिया का पालन करते हुए पूरी विभागीय जांच की गई। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने जांच में हिस्सा लिया था और उसे अपना बचाव करने का पर्याप्त मौका दिया गया।
बता दें कि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक दी गई सजा स्पष्ट रूप से असंगत, मनमानी या अत्यधिक कठोर न हो, तब तक उसे बदलने का आधार नहीं बनता। अदालत ने माना कि अर्द्धसैनिक बल जैसे अनुशासित संगठन में सोशल मीडिया पर इस प्रकार की गतिविधियां गंभीर अनुशासनहीनता मानी जाती हैं। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को वैध ठहराते हुए कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी और वेतन कटौती की सजा को बरकरार रखा। यह फैसला सुरक्षा बलों के कर्मियों द्वारा सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग और सेवा अनुशासन के महत्व को रेखांकित करता है।