बिलासपुर

भूमि विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, तहसीलदार किसी को दस्तावेज़ पेश करने के लिए नहीं कर सकता मजबूर

High Court: भूमि विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तहसीलदार किसी निजी पक्ष के कहने पर किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
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बिलासपुर हाईकोर्ट (photo source- Patrika)

Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने है कहा कि छत्तीसगढ़ लैंड रेवेन्यू कोड के तहत तहसीलदार के पास किसी प्राइवेट प्रतिवादी की अर्जी पर किसी पक्ष को दस्तावेज़ पेश करने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ज़्यादा से ज़्यादा, तहसीलदार दस्तावेज़ प्रस्तुत न करने पर किसी पक्ष के खिलाफ़ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकता है, लेकिन उनकी मर्ज़ी के बिना उन्हें दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें एडिशनल कलेक्टर के 30 मई 2022 के आदेश को चुनौती दी गई। इस आदेश में तहसीलदार के पहले के आदेश को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं को अपनी ज़मीन से जुड़ी ''ऋण पुस्तिका'' पेश करने का निर्देश दिया गया।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि तहसीलदार ने प्रतिवादी नंबर 3 की अर्ज़ी पर यह निर्देश जारी किया और उनके पास किसी प्राइवेट पार्टी के कहने पर दस्तावेज़ पेश करने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं था। प्रतिवादियों ने विवादित आदेशों का समर्थन किया और तर्क दिया कि तहसीलदार ने याचिकाकर्ताओं को ऋण पुस्तिका पेश करने का सही निर्देश दिया।

भू राजस्व संहिता के खिलाफ

  • हाईकोर्ट ने पाया कि पक्षकार सिविल कोर्ट और रेवेन्यू कोर्ट दोनों में मुक़दमा लड़ रहे थे और उनमें से एक पक्ष
  • सुप्रीम कोर्ट भी गया। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेज़ पेश करने के लिए अलग से अर्ज़ी
  • देना और तहसीलदार का उन्हें पेश करने का निर्देश
  • देना छत्तीसगढ़ लैंड रेवेन्यू कोड के संबंधित प्रावधानों के बिल्कुल विपरीत है। कोर्ट ने कहा कि भले ही याचिकाकर्ताओं को दस्तावेज़ जमा करने के लिए कहा गया हो, तहसीलदार के पास किसी प्राइवेट प्रतिवादी के कहने पर उन्हें पेश करने के लिए मजबूर करने का कोई अधिकार या शक्ति नहीं थी।

कलेक्टर ने भी गलती की

कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कोई ऐसी कार्यवाही चल रही होती, जिसमें मामले के निपटारे के लिए दस्तावेज़ पेश करना ज़रूरी होता, तो ऐसा आदेश कानूनी रूप से सही हो सकता था। इसके आधार पर कोर्ट ने माना कि तहसीलदार ने 17 मार्च 2021 का आदेश जारी करके कानून के खिलाफ काम किया और कलेक्टर ने उस आदेश को सही ठहराकर गलती की। कोर्ट ने दोनों आदेशों को रद्द कर दिया और रिट याचिका का निपटारा किया।

Updated on:
22 Jul 2026 02:27 pm
Published on:
22 Jul 2026 02:26 pm