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13 लाख तेंदूपत्ता संग्राहकों को बड़ा झटका, टेंडर विवाद में फंसी चरण पादुका योजना, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

Tender Controversy: छत्तीसगढ़ में 13 लाख तेंदूपत्ता संग्राहकों को इस साल चरण पादुका योजना का लाभ समय पर नहीं मिल सका। टेंडर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी और नियमों में बदलाव के चलते योजना विवादों में घिर गई।
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रायपुर

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Khyati Parihar

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राकेश टेम्भुरकर

Jul 06, 2026

Chhattisgarh News

हाईकोर्ट (photo source- Patrika)

रायपुर@राकेश टेम्भुरकर। Chhattisgarh Charan Paduka Yojana: प्रदेश में 'हरा सोना' कहे जाने वाले तेंदूपत्ता की तोड़ाई का सीजन खत्म हो चुका है, संग्राहकों को उनकी मजदूरी भी मिल गई है, लेकिन जेब में पैसे आने के बाद भी उनके पैर अब तक नंगे हैं। प्रदेश के 13 लाख तेंदूपत्ता संग्राहकों को इस साल बांटी जाने वाली 'चरण पादुका' (जूते) अफसरों की मनमानी और टेंडर के खेल में उलझ कर रह गई है। अब विभाग इसे अगस्त के दूसरे सप्ताह में बांटने की योजना बना रहा है, जबकि इसका वास्तविक उपयोग मई-जून के तपते सीजन में था।

चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाने का था प्रयास

विभागीय सूत्रों के अनुसार, इस भारी विलंब का मुख्य कारण लघु वनोपज संघ के शीर्ष अधिकारियों द्वारा खरीदी के नियमों में गुपचुप तरीके से किया गया बदलाव है। परंपरा के अनुसार संग्राहकों को कैनवास के जूते दिए जाते थे, लेकिन इस बार बिना किसी ठोस आधार के कारखानों में इस्तेमाल होने वाले भारी 'सेफ्टी शूज' की शर्त जोड़ दी गई। इसके अलावा निविदा (टेंडर) में कुछ ऐसी जटिल शर्तें डाली गईं, जिससे परंपरागत रूप से जूता सप्लाई करने वाली छत्तीसगढ़ और देश की कई नामचीन कंपनियां प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गईं। इस गड़बड़ी को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया और टेंडर में किए गए संशोधनों को गलत ठहराते हुए इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बदलाव कुछ चुनिंदा कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया प्रतीत होता है। कोर्ट के आदेश के बाद विभाग को दोबारा टेंडर प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी, जो अब तक जारी है।

31 जुलाई को एमडी अनिल साहू हो रहे हैं रिटायर

समय पर जूते न मिलने और टेंडर प्रक्रिया में इस कथित हेरफेर को लेकर लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक अनिल साहू सहित कई बड़े अधिकारी सीधे तौर पर घेरे में हैं। चर्चा इसलिए भी गर्म है क्योंकि एमडी अनिल साहू इसी महीने 31 जुलाई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में उनके कार्यकाल के आखिरी महीनों में हुए इस विवाद ने विभाग की साख पर सवालिया निशान लगा दिया है।

7 साल बाद शुरू हुई थी योजना

शुरुआत (2005): तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नवंबर 2005 में इस योजना की शुरुआत की थी, जिसमें पहले सिर्फ पुरुष सदस्यों को जूते मिलते थे।

बदलाव (2008-2013): 2008 में महिलाओं को जोड़ा गया और 2013 से महिलाओं की मांग पर उन्हें जूतों की जगह चप्पलें दी जाने लगीं।

योजना बंद (2018): भाजपा सरकार के जाने के बाद कांग्रेस सरकार ने इस योजना को बंद कर दिया और चप्पल-जूतों के बदले नकद राशि देने का प्रावधान किया।

पुनः शुरुआत (2025-2026): विष्णुदेव साय सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस महत्वकांक्षी योजना को दोबारा शुरू किया। वर्ष 2026 में पहली बार यह नियम बनाया गया कि परिवार की महिला मुखिया के साथ-साथ पुरुष सदस्य को भी जूता दिया जाएगा।

खाते में आए 5500, पर पैरों की सुरक्षा गायब

इस साल तेंदूपत्ता की तुड़ाई 15 अप्रैल से 15 जून तक चली। दक्षिण बस्तर से शुरू होकर सरगुजा तक चले इस सीजन में संग्राहकों को 5500 रुपए प्रति मानक बोरा की बढ़ी हुई दर से ऑनलाइन भुगतान सीधे उनके खातों में कर दिया गया। पैसा तो समय पर मिल गया, लेकिन टेंडर विवाद के कारण कड़कड़ाती धूप और जंगलों के कांटों के बीच संग्राहकों को नंगे पैर ही काम करना पड़ा।

तेंदूपत्ता संग्राहकों को जल्दी ही चरण पादुका का वितरण किया जाएगा। कुछ तकनीकी और विधिक कारणों से निविदा प्रक्रिया में थोड़ा विलंब हुआ है। विभागीय स्तर पर युद्धस्तर पर तैयारी चल रही है और अगस्त में इसका वितरण शुरू कर दिया जाएगा। - केदार कश्यप, वन मंत्री, छत्तीसगढ़ शासन