Mother’s Day 2026: मदर्स डे के मौके पर ममता और समर्पण की दो ऐसी कहानियां सामने आई हैं, जो दिल को छू जाती हैं। एक ओर बिलासपुर की रिंकी अरोरा हैं, जो पिछले कई वर्षों से 72 एचआईवी संक्रमित बच्चों के लिए मां बनकर उनके इलाज, भोजन और पढ़ाई की जिम्मेदारी निभा रही हैं।
Mother’s Day 2026: मां सिर्फ वह नहीं होती, जो जन्म देती है, बल्कि वह भी मां होती है, जो किसी अनजान बच्चे के दर्द को अपना बना ले। बिलासपुर की रिंकी अरोरा ऐसी ही एक संवेदनशील शख्सियत हैं, जिन्होंने राज्यभर के 72 जरूरतमंद एचआईवी संक्रमित बच्चों की जिंदगी में उम्मीद की नई रोशनी जलाई है। कोई उन्हें ‘रिंकी दीदी’ कहता है तो कोई प्यार से ‘रिंकी मां’। पिछले आठ वर्षों से वे इन बच्चों के लिए केवल सहारा नहीं, बल्कि ममता, सुरक्षा और भरोसे का दूसरा नाम बन चुकी हैं।
मदर्स डे पर जब दुनिया अपनी मां के प्रति प्यार जता रही है, तब छत्तीसगढ़ के कई एचआईवी संक्रमित बच्चों की मुस्कान की वजह रिंकी अरोरा हैं। वर्ष 2017 में एचआईवी संक्रमित बच्चों की बढ़ती मृत्युदर और बदहाल हालात ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। उन्होंने देखा कि कई बच्चे महंगी दवाइयों के साथ जरूरी पौष्टिक आहार नहीं मिलने के कारण धीरे-धीरे जिंदगी हार रहे हैं। उसी पल उन्होंने तय कर लिया कि वे ऐसे बच्चों के लिए कुछ करेंगी। इसके बाद शुरू हुआ सेवा और ममता का वह सफर, जो आज 72 बच्चों तक पहुंच चुका है।
रिंकी हर महीने इन बच्चों के लिए फूड सप्लीमेंट की व्यवस्था करती हैं। इसमें 5 किलो मल्टीग्रेन आटा, 1 किलो मिक्स दाल, 1 किलो देसी चना, आधा किलो खजूर, आधा किलो गुड़, आधा किलो सोयाबीन बड़ी सहित पौष्टिक अनाज और फल शामिल होते हैं। उनका कहना है कि संक्रमित बच्चों को यदि पर्याप्त पोषण न मिले तो वे कमजोर होते जाते हैं।
रिंकी केवल भोजन और दवाओं तक सीमित नहीं हैं। वे बच्चों की शिक्षा, इलाज, काउंसलिंग और बेहतर भविष्य के लिए भी लगातार प्रयास कर रही हैं। कई बच्चों की स्कूल फीस भरने से लेकर उनके विवाह तक की जिम्मेदारी भी उन्होंने उठाई है। बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, भिलाई समेत कई जिलों के बच्चे आज उनकी इस मुहिम से जुड़े हैं।
छग एचआईवी संक्रमित नेटवर्क की अध्यक्ष रिंकी अरोरा बताती हैं कि समाज में आज भी एचआईवी को लेकर जागरूकता और संवेदनशीलता की कमी है। जरूरतमंद बच्चों तक सरकारी सहायता नहीं पहुंच पा रही है। ऐसे में वे अपने बुटिक व्यवसाय से होने वाली आय और लोगों के सहयोग से यह सेवा कार्य चला रही हैं। रिंकी कहती हैं, "जब कोई बच्चा मुझे मां कहकर बुलाता है, तो लगता है मेरी जिंदगी सफल हो गई। इन बच्चों की मुस्कान ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।
वहीँ बिलासपुर की शिल्पा भगत पीएससी परीक्षा की तैयारी कर रही थीं, तभी गंभीर बीमारी ने उनकी जिंदगी की रफ्तार रोक दी। आंखों की परेशानी इतनी बढ़ गई कि किताबों के छोटे अक्षर भी चुभने लगे, वहीं गर्दन दर्द के कारण लंबे समय तक बैठना मुश्किल हो गया। शिल्पा को लगने लगा था कि उनका और उनकी मां का सपना अधूरा रह जाएगा। एसबीआई बैंक में कार्यरत शिल्पा अपनी मां नीलकांता भगत ने ऐसे समय में हार नहीं मानी। घर का सारा काम खत्म करने के बाद वह रातभर किताबें पढक़र सुनाती थीं और शिल्पा बिस्तर पर लेटे-लेटे सुनकर पढ़ाई करती थीं।
नीलकांता भगत केवल पढक़र ही नहीं सुनाती थीं, बल्कि हर चैप्टर के बाद सवाल पूछकर तैयारी भी मजबूत कराती थीं। 12 से 14 घंटे तक लगातार चलने वाली इस मेहनत ने आखिरकार रंग दिखाया। शिल्पा भगत ने पीएससी परीक्षा पास कर नायब तहसीलदार का पद हासिल किया। वर्तमान में वह बिलासपुर जिले के बोदरी में तहसीलदार का प्रभार संभाल रही हैं। यह कहानी मां के त्याग, विश्वास और बेटी के संघर्ष की प्रेरक मिसाल बन गई है।